Saturday, September 6, 2008

महानगरों को जकड़ रहा है ध्वनि प्रदूषण



दिल्ली में रहने वाली आईटी प्रफेशनल प्रीति चोपड़ा ने कभी गांव का रहन-सहन नहीं देखा था। वह एक बार गांव में रहकर देखना चाहती थीं। अपनी इस हसरत को पूरा करने के लिए पिछले दिनों उन्होंने प्लैन बनाया और अपनी दोस्त अनीता के पूर्वी उत्तर प्रदेश स्थित गांव चली गईं। ट्रेन से उतरने तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था लेकिन जैसे ही वह गांव पहुंचीं, उन्हें लगा मानो यहां के लोग बहुत तेज बोलते हैं या उन्हें खुद कुछ ज्यादा सुनाई देने लगा है। अनीता ने यह बात प्रीति को बताई लेकिन उन्होंने इसे वहम कहकर बात टाल दी। हालांकि प्रीति को इस पर यकीन नहीं हुआ। एक हफ्ते बाद जब वह दिल्ली पहुंचीं तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि अब उन्हें कम सुनाई दे रहा है। इसके बाद प्रीति ईएनटी स्पेशलिस्ट के पास गईं और उन्हें अपनी समस्या बताई। ईएनटी स्पैशलिस्ट ने उन्हें बताया कि दरअसल महानगरों में ध्वनि प्रदूषण हमारी जीवनशैली में शामिल हो गया है। हम दिनभर शोरगुल के बीच रहते हैं और यह अब हमारी आदत में शुमार हो गया है। ऐसे में जब हम किसी ऐसी जगह जाते हैं, जहां ध्वनि प्रदूषण कम होता है तो हमें कुछ अलग-सा महसूस होने लगता है। इसके बाद प्रीति को यह बात समझ में आई कि गांववाले तेज नहीं बोल रहे थे, बल्कि गांव में वे सही तरीके से सुन पा रही थीं। दरअसल, इस तरह की समस्या की शिकार अकेली प्रीति नहीं हैं, बल्कि उनके जैसे हजारों लोग हैं, जो दिल्ली जैसे शहरों में रहते हैं। यहां लगभग हर जगह ध्वनि की मात्रा निर्धारित मानकों से कहीं अधिक है। केंदीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मुताबिक , औद्योगिक क्षेत्र के लिए दिन में 75 और रात में 70 डेसिबल ध्वनि सीमा तय की गई है। कमर्शल इलाकों के लिए यह सीमा दिन में 65 और रात में 55 डेसिबल, जबकि रेजिडेंशल क्षेत्र के लिए दिन में 55, रात में 45 डेसिबल और साइलेंस ज़ोन के लिए दिन में 50 और रात में 40 डेसिबल ध्वनि सीमा तय की गई है। जबकि सीपीसीबी की एक स्टडी के मुताबिक दिल्ली और एनसीआर के सभी इलाकों में ध्वनि निर्धारित सीमा से काफी ऊपर 80 डेसिबल पाई गई। यह तीव्रता लोगों के दिलोदिमाग और जीवनशैली पर असर डाल रही है। यहां हर उम्र के लोगों को सुनने, बात करने और नींद न आने की परेशानी महसूस होती है। बहरापन और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं आज आम होती जा रही हैं। सीपीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक 20 साल तक की उम्र के 34 फीसदी लोगों में ये समस्याएं देखी जा रही हैं। 20 से 40 उम्र वर्ग के 49 फीसदी, 40 से 60 साल के 57 और 60 से ज्यादा उम्र के लगभग 75 फीसदी लोग इस परेशानी को झेल रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली जैसे शहरों में ध्वनि प्रदूषण का सबसे बड़ा स्त्रोत ट्रैफिक है। इसके अलावा म्यूजिक सिस्टम, टीवी, फ्रिज, कूलर, एसी, अवन, एग्ज़ॉस्ट फैन, सीलिंग फैन, वॉशिंग मशीन, कंप्यूटर जैसी घरेलू इस्तेमाल की अन्य चीजें भी प्रदूषण बढ़ा रही हैं। सीपीसीबी की स्टडी में शामिल लोगों से इस बात का सुझाव मांगा गया था कि आखिर इस ध्वनि प्रदूषण से किस तरह मुक्ति मिल सकती है। ज्यादातर लोगों ने कहा, इसके दुष्परिणाम के बारे में लोगों को जागरूक करना चाहिए। सरकारी मशीनरी नियमों के पालन में सख्ती बरते। जरूरत पड़ने पर एनजीओ की मदद ली जाए। साथ ही, पुलिस और सिविक अथॉरिटी को और अधिक सशक्त बनाया जाए। राममनोहर लोहिया अस्पताल के सीनियर ईएनटी स्पैशलिस्ट डॉ. जे. एम. हंस कहते हैं कि एक आम आदमी के सुनने की सहनशक्ति 55 से 60 डेसिबल होती है। आमतौर पर 5 डेसिबल की ध्वनि को धीमी, 25 डेसिबल को साधारण और 60 से अधिक डेसिबल की ध्वनि को तेज शोर यानी प्रदूषण कहा जाता है। इतने ज्यादा शोर में लंबे समय तक रहने पर कान ही नहीं, बल्कि पूरा नर्वस सिस्टम डिस्टर्ब हो जाता है। इसके कारण बेचैनी, तनाव, अनिदा, सिरदर्द, थकान, तनाव, कार्यक्षमता में कमी, बहरापन, कान के आंतरिक भाग में दिक्कत, दिल की धड़कन बढ़ने जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। साथ ही, हाई और लो ब्लडप्रैशर, चिड़चिड़ापन, गैस्ट्रिक, अल्सर, न्यूरो से जुड़ी समस्याएं, याददाश्त कमजोर होने, गर्भस्थ शिशु पर बुरा असर पड़ने, कान में तेज दर्द जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। रॉकलैंड अस्पताल के ईएनटी स्पैशलिस्ट डॉ. ए. के. वर्मा कहते हैं कि ध्वनि प्रदूषण के कारण दिल्ली जैसे शहरों में कान से संबंधित समस्या आम हो गई है और ईएनटी ओपीडी में आने वाले ज्यादातर लोगों को सुनने संबंधी दिक्कतें होती हैं। जी. बी. पंत अस्पताल के न्यूरॉलजिस्ट डॉ. देबाशीष चौधरी कहते हैं कि ध्वनि प्रदूषण से नर्वस सिस्टम डिस्टर्ब होने और सही ढंग से नींद न आने के कारण मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसके शिकार बड़े ही नहीं, स्कूली बच्चे भी हैं। वह कहते हैं कि हाल में आई एक स्टडी के मुताबिक, दिल्ली के 15 फीसदी टीनएजर्स 11 बजे के बाद बिस्तर पर जाते हैं और करीब 1 बजे तक सो पाते हैं। 10 फीसदी स्कूली बच्चों को गहरी नींद नहीं मिलती। उनकी नींद बार-बार टूट जाती है और इस वजह से उठने पर ताजा महसूस नहीं कर पाते। दिनभर सिरदर्द, शरीर में भारीपन और मांसपेशियों में दर्द जैसी समस्याएं रहती हैं। लंबे समय तक ये दिक्कतें होने पर तनाव, याददाश्त में कमी जैसी परेशानियां सामने आने लगती हैं। इससे बच्चे पढ़ाई से दूर भागने लगते हैं। डॉ. चौधरी कहते हैं कि ध्वनि प्रदूषण एक ऐसी समस्या है, जिसे दूर करके कई बीमारियों को नियंत्रित किया जा सकता है। मगर इसके लिए सिर्फ कानून बनाना ही काफी नहीं है। इसके परिणामों के बारे में लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। साथ-साथ नियमों को सख्ती से लागू करने और हर नागरिक को अपना फर्ज समझकर नियमों का पालन करने की जरूरत है। वह कहते हैं कि छोटे-छोटे टिप्स भी इसमें कारगर भूमिका निभा सकते हैं। जैसे गाड़ियों के मेंटीनेंस के लिए समय-समय पर सर्विसिंग कराएं। बेवजह हॉर्न बजाने से बचें, तेज आवाज में टीवी, रेडियो, लाउडस्पीकर न चलाएं, घरेलू उपकरणों को मेंटेन रखें ताकि उनसे अतिरिक्त शोरगुल न हो। बच्चों को शुरू से ही इन सब चीजों का महत्व समझाएं। इससे समस्या काफी हद तक कंट्रोल हो सकती हैसंभार टुडे

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