Wednesday, August 14, 2013

सूचना विभाग में किसके इषारे पर विज्ञापन घोटाले की बू...!!

तो क्या विज्ञापन एजेन्सी विभाग में सूचीबद्व नहीं... तो किसी कृपा से जारी किए विज्ञापन...?
देहरादून। उत्तराखण्ड के सूचना विभाग का विवादित चेहरा हमेषा बरकरार रहा है। विभाग में अधिकारियो की आपसी लड़ाई हो या फिर समाचार पत्रो को विज्ञापन देने का खेल, सभी मामालो में विभाग के विवादित चेहरे हमेषा ही सरकार की किरकिरी कराते रहे हैं। आपदा के दौरान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की किरकिरी कराने वाले पूर्व डीजी विनोद षर्मा को विभाग से हटा दिया गया था और इसकी गाज सूचना विभाग के अपर निदेषक अनिल चंदोला पर भी गिरी थी, चंदोला को सूचना निदेषालय से हटाकर हल्द्वानी के मीडिया सैंटर में तबादला कर भेज दिया गया था लेकिन इसके बाद भी सूचना विभाग में विज्ञापनो का खेल थमने का नाम नही ले रहा। चहेते टीवी चैनलो को मनमांगे रेट पर विज्ञापन जारी किए जा रहे हैं और सरकार को करोड़ो का चूना लगाकर धन की हानि की जा रही ळै इतना ही नही कई इलैक्टाॅनिक चैनलो को सीधे विज्ञापन जारी किए गए हैं जबकि कुछ को एजेन्सी के द्वारा विज्ञापन का खेल खेलकर कमीषन की लूट सूचना विभाग में अभी भी बेरोकटोक जारी है। इस बात का पता तब चला जब कुछ इलैक्टाॅनिक चैनलो को सीधे विज्ञापन के रूप में दस मिनट का विज्ञापन पचास हजार रूप्ए प्रति दस सैकेन्ड के हिसाब से एक दिन में दो बार जारी किया गया लेकिन कुछ चैनलो को यह विज्ञापन उर्धवा एडवर्टटाइजिंग एजेन्सी के माध्यम से जारी किया गया। चूंकि विज्ञापन में एड एजेन्सी का 15 प्रतिषत का कमीषन फिक्स होता है और यह रकम सूचना विभाग के किन अधिकारियो के बीच बंटी इसकी जांच भी की जानी जरूरी है जबकि खुद मुख्यमंत्री ने विभिन्न इलैक्टाॅनिक चैनलो व समाचार पत्रो को सीधे विज्ञापन जारी किए जाने के निर्देष पूर्व में जारी किए थे लेकिन मुख्यमंत्री के इन निर्देर्षो को किसके इषारे पर पलीता लगाया गया और मुख्यमंत्री की छवि को एक बार फिर धूमिल करने का प्रयास मीडिया को गुटो में बांटकर करने का काम किया गया इसकी जांच भी निष्चित रूप से खुद मुख्यमंत्री को करनी चाहिए। वर्तमान में सूचना विभाग के अंदर अनबन अभी भी जारी है और सूचना विभाग के संयुक्त निदेषक राजेष कुमार के पास विज्ञापन जारी किए जाने की जिम्मेदारी भी आ गई है अब निदेषक के बाद राजेष कुमार को विज्ञापन जारी किए जाने का अधिकार मिलने के बाद एक गुट नाराज हो गया है बताया जा रहा है कि पूर्व में विज्ञापन के आरओ काटे जाने की जिम्मेदारी सहायक निदेषक भगतसिह रावत के पास मौजूद थीे लेकिन बीते दिनो टीवी चैनल को विज्ञापन जारी किए जाने के दौरान भगतसिंह रावत द्वारा फाइल पर अनमोदन लाने की बात कहने पर ही आरओ जारी किए जाने की बात कही गई थी और उक्त टीवी चैनल को विज्ञापन जारी नही हो सका था बस इसी बात से साहब का पारा चढ़ गया और तुरन्त इसकी षिकायत उपर तक कर दी गई जिसके बाद भगतसिंह रावत से आरओ काटने की जिम्मेदारी छीन ली गई और यह जिम्मेदारी संयुक्त निदेषक राजेष कुमार को सौंप दी गई। सूचना विभाग में विज्ञापन का घोटाले की बू काफी समय से चली आ रही है और सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या जिस एजेन्सी के माध्यम से सूचना विभाग विज्ञापन जारी का रहा है वह एजेन्सी विभाग में सूचीबद्व है या नहीं जबकि एजेन्सी को सूचना विभाग मे सूचीबद्व होने के साथ डीएवीपी में भी सूचीबद्व होना जरूरी है अब बिना विभाग में सूचीबद्व किए ही एजेन्सी किस आधार पर विज्ञापन जारी कर रही है इसकी जांच भी की जानी जरूरी है सूचना विभाग के नए निदेषक व सचिव को इस मामले में जानकारी है या नही इसकी भी जांच की जानी जरूरी है कहीं ऐसा तो नही सूचना विभाग का कोई अधिकारी आंखो में धूल झोंककर खुद कमीषन को खेल खेल रहा है। सूचना विभाग में गड़बड़ी का गड़बड़ झाला कोई नया नहीं यहां हर कोई अपनी हैसियत के हिसाब से अपना कमीषन पक्का करता है और ईमानदार अधिकारी व कर्मचारियो की फौज बेहद कम है इन इमानदार लोगो को या तो कुर्सी पर नही रहने दिया जाता या फिर उनको वो काम नही सौंपा जाता जिसके वह लायक हैं। समय रहते उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने सूचना विभाग मे पारदर्षी तरीके से विज्ञापन जारी किए जाने का खाका तैयार नही किया तो यह मीडिया को दो गुटो में बांटे जाने का खेल साबित हो सकता ळै और इस मकसद में वो लोग कायमाब हो सकते ळैं जो मुख्यमंत्री की छवि को मीडिया के भीतर बदनाम करना चाहते हैं। अब मुख्यमंत्री इस पूरे प्रकरण की जांच कर दोशी लोगो के खिलाफ क्या कार्यवाही करते हैं इसका इन्तजार सूचना विभाग के अधिकारी व कर्मचारी भी कर रहे हैं।

Monday, August 12, 2013

मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात कौन है यौन उत्पीड़न का आरोपी अधिकारी


देहरादून। उत्तराखण्ड में सैक्स स्कैंडल के साथ राजनैतिक नेताओ की परिपाटी भी राजनीति के चष्मे से झलकती हुई दिखी है वहीं इसके चलते राज्य का नाम देष के अन्य राज्यो में भी बदनाम हुआ है इस बदनामी का कारण उत्तराखण्ड के ऐसे राजनेता रहे जिन्होने विकास के पायदानो पर उत्तराखण्ड को आगे बड़ाने का काम किया लेकिन साथ ही सैक्स स्कैंडल जैसे मामलो में उत्तराखण्ड की छवि को भी बदनाम कर डाला जिसके चलते उनका राजनैतिक कैरियर तो चैपट हुआ ही उत्तराखण्ड के राजनेताओ को भी उसी चष्मे से देखा जाने लगा। राज्य में यौन उत्पीड़न के मामले लगातार सामने आते जा रहे ळें और इन मामलो में पुलिस, राजनेता और अब षासनस्तर के अधिकारियो की सन्लिप्तता भी सामने आ गई है जिससे साबित हो गया ळै कि उत्तराखण्ड में ऐसे मामले अब षासन का केन्द्र बिन्दु बनते जा रहे ळैं। उत्तराखण्ड के कई राजनेताओ पर यौन उत्पीड़न के मामले देष की सुर्खियां बनते रहे और कांग्रेस के तिवारी षासनकाल में कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत को जैनी कांड के चलते मंत्री पद से भी इस्तीफा देना पड़ा लेकिन बाद में मामले का पटाक्षेप होने के बाद हरक सिंह का दामन साफ हो सका लेकिन कई सालो तक हरक सिंह इस कांड के चलते अपना राजनैतिक कैरियर तबाह कर बैठे इसके बाद हैदराबाद में हुए एनडी तिवारी के सैक्स स्कैंडल ने तिवारी को राज्यपाल के पद से विदा कर दिया और राजनैतिक कैरियर भी तिवारी का कांग्रेस में तबाह हो गया तबसे लेकर आज तक तिवारी अपना राजनैतिक कैरियर षुरू नही कर पाए हैं लेकिन अब षासन के अधिकारियो पर सैक्ैस स्कैंडल के आरोप सामने आए हैं और सचिवालय में तैनात समीक्षा अधिकारी के पद पर तैनात एक महिला ने मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात दो अधिकारियो पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाकर खलबली मचा दी है। सचिवालय के भीतर इस तरह की बात आना कोई बड़ी बात नहीं और समय समय पर ऐसी बातें पूर्व में भी उजागर होती रही हैं लेकिन वर्तमान में उत्तराखण्ड सरकार के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के कार्यालय में तैनात इन अधिकारियो पर आरोप लगने के बाद षासन की कार्यवाही तेज हो गई है, खुद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इस मामले की षिकायत सामने आने के बाद इसकी जांच के आदेष दिए हैं। महिला उत्पीड़न के मामले पर सुप्रीम र्कोअ के दिषा निर्देष के अनुरूप् राज्य स्तर पर प्रमुख सचिव को इसकी जिम्मेदारी दी गई है और वर्तमान में प्रमुख सचिव राधा रतूड़ी इस मामले की जांच कर रही हैं लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय के अंदर यदि काम करने वाली महिला सुरक्षित नही तो ऐसे में उत्तराखण्ड के अंदर महिलाओ की सुरक्षा कैसी होगी इसका आंकलन भी सरकार को खुद करना होगा। मुख्यमंत्री का कार्यालय ही जब महिलाओ के लिए सुरक्षित नही तो ऐसे में प्रदेष के अंदर मौजूद महिलाओ की स्थिति जिलो और गांवो में किस कदर होगी इसका आंकलन भी राजनैतिक चष्मे से किया जाना बेहद जरूरी है। हमेषा से ही राजनेताओ का दामन यौन उत्पीड़न के मामले पर दागदार होता रहा है लेकिन यह पहला मौका है जब उत्तराखण्ड सरकादके मुख्यमंत्री कार्यालय में यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया है हाला  िकइस मामले में उत्पीड़न का षिकार हुइ महिला ने मुख्यमंत्री को षिकायत की ळै लेकिन अभी तक महिला द्वारा पुलिस को षिकायत ना किए जाने का कारण भी सामने नही आ पाया है। बताया जा रहा है कि जिस अधिकारी पर उत्पीड़ का आरोप लगा है उसमे से एक अधिकारी जून माह में रिटायर हो गया है जबकि एक अन्य अभी भी मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात है। सूत्रो से मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री के कार्यालय में तैनात एक बड़े अधिकारी का नाम भी इस मामले में सामने आ रहा हैलेकिन उसे बचाने की हर सम्भव कोषिष की जा रही ळै क्योकि इस अधिकारी के आधीन आने वाले एक विभाग में महिलाओ की तैनाती सबसे ज्यादा की गई है जिसकी जांच की जानी भी बेहद जरूरी है वहीं इस अधिकारी के बारे में आम चर्चा है कि इसका चरित्र हमेषा से ही चर्चित रहा है।

Saturday, August 10, 2013

कैबिनेट मंत्री हरक के पूर्व पीआरओ रावत को क्यो ठिकाने लगाया चर्चित महिला ने...??

देहरादून। उत्तराखण्ड में कांग्रेस की सरकार और सत्ताधारी कैबिनेट मंत्री के पीराओ का कत्ल राजधानी देहरादून में हो जाना कानून व्यवस्था की पोल खोल रहा है साथ ही यह भी साबित कर रहा है कि क्या देहरादून की पुलिस का अपराधियो को खौफ नहीं, याफिर ऐसा गिरोह देहरादून में सक्रिय हो गया है जो एमबीबीएस में दाखिला कराने के लिए मोटी रकम का खेल खेल रहा है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि जब कैबिनेट मंत्री का पूर्व पीआरओ हत्या का षिकार हो गया तो ऐसे में आम जनता कितनी सुरक्षित होगी इसका जवाब तो देहरादून पुलिस के पास ही मौजूद होगा। हालाकि पुलिस इस मामले की कडि़यां सुलझ जाने का दावा कर रही है। वहीं सूत्रो से मिली जानकारी के अनुसार युद्ववीर रावत की हत्या के पीछे कोई बड़ा मामला भी हो सकता है क्योकि कैबिनेट मंत्री हरकसिंह रावत के पूर्व पीआरओ रावत रूद्रप्रयाग क्षेत्र के साथ कई कामो को देखते थे और हरकसिंह के सबसे करीबी माने जाते थे एक राजनैतिक दल के नेता ने नाम ना छपने की षर्त पर खुलासा किया है कि जिस बसंत बिहार की चर्चिित महिला का नाम इस मामले में सामने आया है उसके द्वारा पूर्व में भी एमबीबीएस में दाखिला दिलाने के नाम पर मेरठ के एक व्यक्ति से 17 लाख रूप्ए लिए गए थे लेकिन आज तक वह रकम वापस नही की गई। प्रौपर्टी के कारोबार में इस विवादित महिला का नाम कई बार सामने आ चुका है और उक्त महिला मूल रूप् से मेरठ की रहने वाली है जो वर्तमान मेंबसंत बिहार थाना क्षेत्र मे रहती है वहीं इस मामले में पकड़ा गया अन्य आरोपी हरिद्वार निवासी है जिसकी कडि़यां उक्त महिला से पुलिस को पूछताछ के दौरान मिलती हुई नजर आई हैं वहीं पोंटा के बलराज षर्मा के हर पहलू की जांच भी पुलिस अपने स्तर से कर रही है। दून अस्पताल में जब युद्ववीर रावत का षव रखा हुआ था तो रावत के एक करीबी दोस्त का साफ कहना था कि युद्ववीर को साजिष के तहत मौत क घाट उतारा गया है और हत्या के बाद अगले दिन सुबह बसंत बिहार निवासी सुधा पटवाल, हरिद्वार निवासी प्रदीप चैहान, कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत के आवास पर मौजूद थे और उनके द्वारा पुलिस के अधिकारियो को फोन कर अपनी मौजूदगी वहां होने की बात कही थी और उक्त लोग पुलिस के भीतर अपना रौब गालिब कर रहे थे लेकिन पुलिस द्वारा अपने स्तर से की गई जांच मंे इस बा का पता चला है  िकइस हत्या में इन लोगो की संलिप्तता मौजूद है हालाकि पुलिस ने अभी जांच पूरी नही की है लेकिन माना जा रहा ळै कि मामला हाई प्रोफाइल होने के चलते पुलिस एक दो दिन के भीतर हत्या के मामले में आरोपियो की गिरफतारी दिखा सकती है। पुलिस को जाच में यह भी पता चला है कि युद्ववीर की जेब में पटेल नगर स्थित एसजीआरआर मैडिकल कलेज का 5.23 लाख का एक डीडी भी मिला है और इसके अलावा बलराज षर्मा ने 14 लाख रूप्ए की धनराषि यूद्ववीर दी थी। माना जा रहा है यह रकम हड़पने के लिए युद्ववीर का कत्ल किया हो और इस मामले में करीबी लोगो का हाथ रहा हो। पुलिस अपने स्तर से इस बात की भी जांच कर रही ळै कि युद्ववीर की हत्या किस स्थान पर की गई और उसकी लाष को ठिकाने लगाने के लिए राजपुर खेत्र के सुनसान इलाके को क्यो चुना गया क्योकि पुलिस को जांच में इस बात का भी पता चला ळै कि युद्ववीर की हत्या मौके पर ना करके किसी अन्य स्थान पर की गई थी जिसके बाद लाष को दूसरे स्थान पर ठिकाने लगाया गया क्योकि मौके पर पुलिस को खून के कोई भी निषान नही मिले हैं। पुलिस इस हत्या के मामले का जल्द खुलासा करने का खाका तैयार करने में जुट गई है लेकिन इस हत्या से रूद्रप्रयाग के लोगो में साफतौर से नाराजगी भी देखी जा रही है।

Thursday, August 8, 2013

अंधेर नगरी, चैपट राजा, पुलिस थानो में फर्जी मुकदमे दर्ज करा जा।

देहरादून। उत्तराखण्ड की मित्रता सेवा सुरक्षा पुलिस का नारा देहरादून जिले की पुलिस पूरा करती नही दिख रही। यही कारण है कि देहरादून जिले में पुलिस थानो के भीतर मुकदमे दर्ज करने में पुलिस बड़े साहब का इन्तजार करती है। बिना साहब की मर्जी के किसी भी थाने में कोई मुकदमा दर्ज नही होता जबकि फर्जी मुकदमो को कायम करने में पुलिस नम्बर 1 बन जाती है। पुलिस की इस छवि से आम जनता के बीच पुलिसिंग की व्यवस्था पर विष्वास उठता जा रहा है वहीं इस मामले में जनपद के पुलिस कप्तान केवल खुराना की भूमिका भी संदेह के घेरे में आती हुइ्र दिख रही है। अपने ही महकमे में एक दिन का वेतन काटे जाने के मामले में जनपद के पुलिस कप्तान न0 1 की श्रेणी में जा पहुंचे हैं और पुलिस के ऐसे कर्मचारी जिनका एक दिन का वेतन काटा गया वो भी खासे नाराज चल रहे हैं। इसके साथ ही खनन को लेकर भी इमानदारी से काम करने वाले पुलिस कर्मियो को पुरस्कृत करने के बजाए उन्हें लाइन हाजिर किया जाना भी साबित कर रहा है कि जनपद का पुलिस कप्तान अपनी दूरदर्षी सोच के बजाए दूसरे की सोच से जनपद की पुलिस को चला रहा है। जबकि थाने चैकी में आने वाली हर फरियाद को सुनने के निर्देष उत्तराखण्ड के डीजीपी सत्यव्रत बंसल ने भी जारी किए थे और स्पश्ट रूप् से सभी थाने चैकियो को निर्देष दिए गए थे कि हर आने वाली षिकायत पर तुरन्त कार्यवाही की जाए लेकिन देहरादून जनपद का हाल बेहद खराब है यहां अंधेर नगरी चैपट राजा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है और पुलिस फर्जी मुकदमो को कायम कर उसे सच साबित करने में जुटी है। पुलिस की इस कार्यषैली से कई लोग परेषान है लेकिन पुलिस के डर के कारण अपनी आवाल बुलन्द नही कर पा रहे। ऐसा ही एक मामला उस समय सामने आया जब प्रभा वर्मा नाम की एक महिला द्वारा वर्श 2011 में भेजे गए अष्लील एसएमएस का जिक्र कोतवाली में लिखाई गई 23 जुलाई की रिर्पोट में किया गया। इस रिपोर्ट में दो साल बाद मुकदमा दर्ज किया गया और इस झूइे मुकदमे को कायम करने के लिए ऐसे लोगो की मंडली षामिल हुई जिन्होने जनपद के पुलिस कप्तान की छवि को भी बट्टा लगाने का काम कर दिया जबकि 27 जुलाई को धारा चैकी एवं 30 जुलाई को थाना डालनवाला में दी गई तहरीर पर कोई मुकदमा दर्ज नही किया गया इसके साथ ही जिले क पुलिस कप्तान ने इस मामले में सत्यता जाने बिना किस आधार पर कोतवाली देहरादून में आनन फानन में मुकदमा दर्ज कराया गया इसकी जांच भी की जानी बेहद जरूरी है। क्या देहरादून की पुलिस इतनी बेलगाम हो गई है कि उसे मानवाधिकार का भी डर नहीं। जबकि जनपद के पुलिस कप्तान को सत्यता जानने के बाद ही मकदमे को कायम करना चाहिए था लेकिन कइ दिनो बाद भी इस मामले में पुलिस ने बिना विवेचना किए ही मुकदमा अपराध संख्या 55/13 कायम कर लिया और अब तक इस मामले में पुलिस ने क्या कार्यवाही की इसका जवाब तो पुलिस को समय रहते जरूर देना होगा और इसके साथ ही कई अन्य मामलो में भी पुलिस को जवाब देने के लिए एक स्वयं सेवी संस्था कोर्ट की षरण में जाने की तैयारी कर रही हैं बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि ऐेसे लोग ही पुलिस के मनोबल को तोड़ने का काम कर रहे ळैं जिनके कन्धो पर जिले की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है वहीं सूत्रो से मिली जानकारी के अनुसार देहरादूनक े जनपद के अंदर विभिन्न थाने चैकियो में तैनात पुलिस के ऐसे इमानदार अफसर परेषान नजर आ रहे हें और वह अपनी आमाद पुलिस लाइन में कराने के लिए जल्द ही प्रदेष के डीजीपी सत्यव्रत बंसल से गुहार लगा सकते हैं। नाम ना छापने की षर्त पर उन्होने बताया कि देहरादून जनपद में वर्तमान पुलिस कप्तान का कार्यकाल ऐसा नही देखा जैसा वर्तमान में नजर आ रहा है।

Friday, August 2, 2013

कप्तान साहब प्रेमनगर क्षेत्र में किसके इषारे पर चलता है सट्टा, षराब और नषे का कारोबार.....??

देहरादून। प्रेमनगर क्षेत्र में नषे, सट्टे और षराब का वो कौन कारोबारी है जिसके इषारे पर क्षेत्र में यह धन्धा फल फूल रहा है और पिछले कई महीनो में जितने भी चैकी इन्चार्ज व थानेदार तैनात रहे हैं वो कार्यवाही क्यो नही कर पाए। निष्चित रूप से यह सवाल इसलिए उठाया जा रहा है कि देहरादून के पुलिस कप्तान केवल खुराना को इमानदार पुलिस अफसर के रूप् में इसलिए जाना जाता है कि वह काफी इमानदार लोगो की कतार में खड़े नजर आते है लेकिन पुलिस कप्तान को प्रेमनगर क्षेत्र में पूरी पुलिस चैकी केा लाइन हाजिर क्यो करना पड़ा यह भी बड़ा सवाल देहरादून की जनता जनपद के पुलिस कप्तान से पूछती हुई नजर आ रही है। पुलिस कप्तान ने प्रेमनगर क्षेत्र में जाम लगने के कारण चैकी इन्चार्ज सहित पूरी चैकी को लाइन हाजिर कर दिया लेकिन क्या इसके बाद महकमा ऐसी घटनाएं रोक पाने में कामयाब हो जाएगा इस सवाल का जवाब आने वाले समय में जरूर मिलेगा लेकिन दोपहर के समय राजपुर रोड के घन्टाघर इलाके में लम्बा जाम लग जाता है और धारा चैकी इन्चार्ज जाम को दुरूस्त कर पाने में नाकामयाब साबित होते हैं लेकिन जनपद के पुलिस कप्तान को यह बात भी समझनी होगी कि प्रेमनगर क्षेत्र में सहसपुर जाने के दौरान जाम की जो हालत देखी गई उसी तर्ज पर धाराचैकी क्षेत्र में भी जाम का आंकलन खुद करें और अगर यह बात सच साबित होती है तो खुद ही तय करें कि क्या चैकी इन्चार्ज इसके लिए दोशी नहीं। बड़ सवाल यह भी उठ रहा है कि जनपद देहरादून की पुलिसिंग को लेकर जैसे दावे कप्तान केवल खुराना ने तैनाती के बाद किए थे अब उन दावो की हवा निकलती दिख रही है। सबसे पहले देहरादून की यातायात व्यवस्था को ठीक करने की वाहवाही लूटने वाले कप्तान को प्रेमनगर में जाम लगने के बाद इस हकीकत को बयां कर दिया कि अभी भी देहरादून की यातायात व्यवस्था पटरी पर नही आई है लेकिन मीडिया के कुछ लोगो द्वारा यातायात व्यवस्था को लेकर षुरूआती दौर में ऐसा बवंडर मचाया कि सड़को पर यातायात दिखता हुआ नजर नही आया लेकिन अब पंचायती मंदिर, घन्टाघर सहित कई जगहो पर जाम की बुरी हालत से फिर जनता को दो चार होना पड़ रहा है। इसके अलावा एक बड़ा सवाल देहरादून जनपद के पुलिस कप्तान से कि क्या वो ऐसे थानेदारो व चैकी इन्चार्जो के खिलाफ कार्यवाही करेंगें जो पुलिस की साख को बट्ट्ा लगाने का काम कर रहे हैं और पुलिस के मनोबल को खुद तोड़ रहे हैं। पुलिस के सूत्रो से मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान में देहरादून के पुलिस कप्तान की कार्यषैली से कई लोग परेषान नजर आ रहे हैं और उनका साफ मानना है कि देहरादून की पुलिसिंग अब पूरी तरह बदल गई है और थाने चैकियो की बजाए पुलिस लाइन में ही बेहतर नौकरी की जा सकती है इसके साथ्ी ही देहरादून के ऐसे पुलिसकर्मी जिनका एक दिन का वेतन पूर्व में काटा गया है वो भी ये सवाल पुलिस विभाग से नाम ना छापने की षर्त पर पूछ रहे हैं कि क्या  एक दिन का वेतन काटे जाने का अधिकार जनपद के पुलिस कप्तान को है लेकिन पुलिस व्यवस्था को सुधारने के लिए हर किसी को खुद पहल करनी होगी और इमानदारी से काम कर ऐसे लोगो को जेल भेजना होगा जो वास्तविक रूप से अपराधो के लिए दोशी हैं। पिछले एक सप्ताह से लगातार जनपद देहरादून के अंदर पुलिस को कितनी षिकयतें मिली और उन पर क्या कर्यवाही हुइ इसका जवाब भी पद पुलिस के कप्तान के पास मौजूद नहीं क्योकि पिछले चार दिनो से लगातार जनपद के पुलिस कप्तान फोन उठाना तो दूर बात करने की जहमत भी नही उठा रहे, उनके मोबाइल फोन को कभी उनका गनर तो कभी उनके आॅफिस से पीआरओ फोन कर जानकारी हासिल कर लेता है लेकिन खबर के बारे में कोई भी यह बताने से बचता है कि आखिर देहरादून जिले में कितने षिकायती पत्रो पर क्या कार्यवाही हुई। अब देखना होगा कि क्या जनपद का पुलिस कप्तान पिछले एक सप्ताह के भीतर आई षिकायती पत्रो पर क्या कार्यवाही करते ळैं और षिकायत दर्ज ना करने वाले थाने व चैकी इन्चार्जाे को क्या सजा देते ळैं।