Thursday, August 4, 2011

उत्तराखण्ड में 2012 चुनाव समय पर होंगे।

पेड न्यूज, फर्जी वोटिंग, फंड मिसयूज पर लगेगी रोक।

देहरादून। । उत्तराखण्ड में विधान सभा चुनाव की तैयारियां को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रदेश के आला अधिकारियों की बैठक के साथ जो संकेत दिए हैं उससे चुनाव समय पर होने की बाते सामने आ रही हैं। सात राजनैतिक दलो के साथ विचार करने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को कई समस्याओ से भी रूबरू कराया गया है। जिनमें उत्तराखण्ड में फर्जी वोटिंग, पोलिंग स्टेशनो की दूरी, पेड न्यूज, पब्लिक फंड का मिस्यूज, मिसिंग वोटरो को ढूंढना, कैश के बदले वोट सिस्टम सहित कई अन्य बातो के सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग अब इन सब पर पैनी नजर रख रहा है। उत्तराखण्ड में विधान सभा चुनाव को लेकर जिस तरह से डुगडुगी बजनी शुरू हो गई है उससे साफ संकेत जा रहे हैं कि विधान सभा 2012 के चुनाव अपने नियत समय में दिसम्बर जनवरी में होने तय हैं क्योकि एनसीपी व सीपीएम के अलावा किसी भी अन्य राजनैतिक पार्टी ने उत्तराखण्ड में विधान सभा चुनाव नवम्बर में कराए जाने की बात मुख्य चुनाव आयुक्त को नही कही है जिससे साफ संकेत हो गए है कि कांग्रेस, भाजपा, बसपा, उक्रांद के साथ साथ कोई भी राजनैतिक पार्टी समय से पहले चुनाव नही कराना चाहती। जबकि चुनाव आयोग अपनी पूरी तैयारी के साथ विधान सभा चुनाव की कमान संभालने को तैयार बैठा है। उत्तरप्रदेश व उत्तराखण्ड का दौरा करने के बाद मणीपुर, पंजाब, गोवा दौरे के बाद ही विधान सभा चुनाव की होने वाली तिथि का पता चल पाएगा क्योकि मुख्य चुनाव आयुक्त अभी 3 राज्यो का दौरा करने के बाद अपनी रिपोर्ट केन्द्र को सौंपेंगे जिसके बाद ही देश के 5 राज्यो में 2012 में हाने वाले विधान सभा चुनाव की तिथि तय हो पाएगी। वैसे माना जा रहा है कि उत्तरप्रदेश के साथ साथ उत्तरारखण्ड में एक साथ चुनाव सम्पन्न कराए जा सकते हैं और दोनो ही राज्यो में चुनाव आयोग अपनी तैयारी के साथ मतदाताओ के वोटर कार्ड बनाने की अंतिम प्रक्रिया पूरी कर रहा ळै। मुख्य निर्वाचन आयुक्त का साफ मत है कि उत्तराखण्ड में लिफाफो में पैसा वोटरो को बाटा जाता है और पेड न्यूज की उत्तराखण्ड में बहुत बड़ी समस्या सामने है जिसे दूर करने के लिए कोई कसर नही छोड़ी जाएगी। उनके अनुसार बिहार में पेड न्यूज पर रोक लगाने के लिए जिस तरह की कमेटी बनाई थी उसे उत्तराखण्ड में भी लागू किया जाएगा। इसके अलावा मिसिंग वोटर जो यूथ की श्रेणी मे हैं उन्हे ढूंढकर मतदान स्थल तक पहुचाने के लिए जागरूकता अभियान भी शुरू किए जायेंगे। इसके अलावा पब्लिक फंड का मिस्यूज होने की शिकायते ंभी जिस तरह से सामने आ रही है उस पर भी लगाम लगाई जायेगी। एमपी व एमएलए चुने जाने के कई सालो बाद तक भी अपनी फंड को खर्च नही करते और चुनावी वर्ष के दौरान फंड को खर्च किया जाता है जो जनता के हित में ठीक नही। उनके अनुसार कई पोलिंग स्टेशन पर्वतीय क्षेत्रों के कारण दूर स्थान पर मौजूद हैं जिन्हे पास किया जाएगा। उन्होने कहा कैश के बदले वोट सिस्टम को उत्तराखण्ड मे लागू नही होने दिया जाएगा और मतदाताओ की कम संख्या भी इसी कारण बढ़ रही है कि राजनेता कैश के बदले वोट सिस्टम को लागू कर रहे हैं जो स्वस्थ चुनाव सम्पन्न कराने के लिए ठीक नहीं। उत्तराखण्ड मे होने वाले विधान सभा चुनाव को लेकर निर्वाचन आयोग कड़े तेवर में आ गया है और माना जा रहा है कि मार्च में बोर्ड की परीक्षाएं होने के कारण पहले चुनाव को इसी माह कराने का निर्णय था लेकिन अब इस पर एक राय नही बन पायी है और अब उत्तराखण्ड में 2012 का चुनाव अपने नियत समय में होगा। 2007 में जिस तरह दिसम्बर माह में आचार संहिता लगी थी ठीक उसी तरह 2012 के इलैक्शन में भी वही रोस्टर प्रणाली को लागू किया जाएगा। इसके अलावा अगस्त माह तक टाªंसफर पाॅलीसी के तहत 3 साल से ज्यादा एक ही जनपद में रहने वाले अधिकारियो को इधर से उधर किया जाएगा। वही निर्वाचन आयोग बीएलओ को ज्यादा मजबूत करने पर भी ध्यान दे रहा है उसके अनुसार बीएलओ मतदान स्थल पर वही का होना चाहिए जिससे मतदाताओ को पहचानने में परेशानी ना हो कुल मिलाकर निर्वाचन आयोग उत्तराखण्ड में चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार हो गया है लेकिन यह भी साफ संकेत हो गए है कि उत्तराखण्ड में समय पर चुनाव सम्पन्न होगे लेकिन निर्वाचन आयोग के अनुसार वह किसी भी राज्य में 6 महीने पहले चुनाव सम्पन्न करा सकता है इसके लिए उसे राज्य सरकार की अनुमति की कोई आवश्यकता नही होती।

राज्य सरकार चिकित्सकों की सुरक्षा के लिए संवेदनशील है। निशंक

देहरादून, 03 अगस्त, 2011मुख्यमंत्री डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक से बुधवार को सचिवालय में प्रांतीय चिकित्सक संघ के पदाधिकारियों ने भेंट कर राज्य सरकार द्वारा सिक्योरिटी एक्ट बनाने के प्रस्ताव को कैबिनेट में मंजूरी मिलने पर धन्यवाद दिया।इस अवसर पर मुख्यमंत्री डाॅ. निशंक ने कहा कि राज्य सरकार चिकित्सकों की सुरक्षा के लिए संवेदनशील है। उन्होंने कहा कि सिक्योरिटी एक्ट को लागू कर सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है। मुख्यमंत्री डाॅ. निशंक ने कहा कि सरकार डाक्टरों एवं चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा हेतु संकल्पबद्ध है। आम आदमी को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिले, इसके लिए चिकित्सक भी अपने कर्तव्यों का पालन सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि सरकार ने आम आदमी को बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न योजनाएं शुरू की है, जिनका लाभ उन्हें मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि चिकित्सालयों में आधुनिक उपकरण स्थापित किये किये है। साथ ही सचल चिकित्सालय भी संचालित किये जा रहे है।मुख्यमंत्री से भेंट करने वालों में प्रांतीय चिकित्सक संघ के अध्यक्ष डाॅ. एस.डी.जोशी, महासचिव डी.पी.जोशी, सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे।

Thursday, May 5, 2011

भारत को भी उत्तराखण्ड में नये रेलवे परिपथ बनाने चाहिएः डाॅ0 निषंक

नयी दिल्ली 5 मई, 2011   उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री डाॅ0 रमेष पोखरियाल निषंक ने यहां योजना आयोग के उपाध्यक्ष डाॅ0 मोन्टेक सिंह आहलूवालिया की अध्यक्षता में योजना भवन में आयोजित 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंतिम वर्ष में अपने राज्य हेतु 666 करोड़ रुपए की अतिरिक्त सहायता समेत 7800 करोड़ रुपए की 2011-12 की वार्षिक योजना को अनुमोदित कराने में सफलता प्राप्त की। यह विगत वर्ष की योजना से 1000 करोड़ रुपए अधिक है।

इस अवसर पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष डाॅ0 मोेन्टेक सिंह आहलूवालिया ने उत्तराखण्ड द्वारा हाल के वर्षों में निरन्तर बेहतर प्रगति और विकास की गति बनाये रखने की सराहना करते हुए यकीन दिलाया कि केन्द्र के स्तर पर राज्य में बेहतर रेल तथा हवाई सेवाओं की सुविधाओं के विस्तार की मांग को मंजूर कराने में वह पूरी मदद देंगे। उन्होंने सलाह दी कि राज्य इन सेवाओं के लिए अपना प्रस्ताव षीघ्रता से उपलब्ध कराये। डाॅ0 आहलूवालिया ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में पूरे राष्ट्र में उत्तराखण्ड के बेहतर कार्य की भी सराहना की।

इससे पहले उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री डाॅ0 निषंक ने देष के हिमालयी राज्यों की विषम भौगोलिक परिस्थितियों और समस्याओं का विस्तार से उल्लेख करते हुए पुराने हिमालयी राज्यों तथा उत्तर-पूर्व के अषान्त राज्यों के मुकाबले उत्तराखण्ड की आवष्यकताओं को भारत सरकार द्वारा नजरअंदाज करने का उल्लेख करते हुए कहा कि पड़ोसी देश चीन द्वारा भारतीय सीमा तक रेलवे का विकास किया जा रहा है। वर्तमान में बीजिंग से ल्हासा तक रेल मार्ग सृजित हो चुका है तथा उत्तराखण्ड की सीमा के सन्निकट तकलाकोट तक इसका विस्तार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि संघर्ष या युद्ध की स्थिति में सीमा तक सेना एवं सैन्य सामग्री की पहुंच शीघ्रतापूर्वक सुनिष्चित हो सके, इस हेतु भारत सरकार को ऋषिकेष-कर्णप्रयाग, टनकपुर- बागेष्वर, बागेष्वर-कर्णप्रयाग रेलवे परिपथ के निर्माण कार्य शीघ्र किये जाने की आवश्यकता है। डाॅ0 निषंक ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य के विकास एवं राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से शिमला-त्यूणी-लोहाघाट हिमालयन हाइवे (भ्पउंसंलंद भ्पहीूंल) का निर्माण कराया जाना आवश्यक है। इस प्रकार की संस्तुति हिमालयी राज्यों एवं क्षेत्रों की समस्याओं पर योजना आयोग, भारत सरकार द्वारा गठित टास्क फोर्स ने भी अपनी रिपोर्ट में दी है। इसे शीघ्रता से कार्यरूप दिया जाये।
उत्तराखण्ड की चीन एवं नेपाल से क्रमशः 350 किमी0 एवं 275 किमी0 लम्बी अन्तर्राष्ट्रीय सीमायें खुली होने का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों के समेकित विकास के लिये बार्डर एरिया डेवलपमैन्ट प्लान के अन्तर्गत राज्य के सभी 26 सीमान्त विकासखण्डों के विकास हेतु तथा उन्हें सड़क, विद्युत, दूरसंचार सुविधाओं से जिला मुख्यालय से जोड़ने हेतु यह योजना लागू करने की मांग की।
इस मौके पर डाॅ0 निषंक ने अनुरोध किया कि उत्तराखण्ड में सभी केन्द्र पोषित योजनाओं का वित्त पोषण पूर्वोत्तर सीमान्त के राज्यों की भांति ही 90ः10 के अनुपात में किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उग्र और अषान्त क्षेत्रों को शान्त क्षेत्रों के मुकाबले अधिक महत्व दिये जाने के दोहरे मापदण्ड से गलत संकेत जाते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखण्ड को 2001-02 में विषेष श्रेणी राज्य का दर्जा दिया गया था, परन्तु वित्त पोषण के मामले में इस राज्य की भारी उपेक्षा की जाती है, जिसके परिमार्जन के लिए 2001-02 से 2010-11 तक की अवधि की अवषेष धनराषि 2400 करोड़ रुपए एकमुष्त विषेष पैकेज के रुप में स्वीकृत की जाय।

उन्हांेने कहा कि उत्तराखण्ड भी पूर्वोत्तर राज्यों की भांति विशेष श्रेणी का राज्य है। अतः राज्य में नैनी-सैनी (पिथौरागढ़) चिन्यालीसौड़ (उत्तरकाशी) तथा गौचर (चमोली), हवाई-अड्डों का विकास भी इसी फार्मूले पर शत-प्रतिशत अवस्थापना अनुदान के माध्यम से भारत सरकार के वित्त पोषण से किया जाना आवश्यक है, क्योंकि ये तीनों स्थल संवेदनशील अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर भी स्थित हैं, तथा इनका सामरिक महत्व भी है। डाॅ0 निषंक ने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची में रेलवे केन्द्रीय सूची का विषय है, इसके बावजूद उत्तराखण्ड सरकार पर रेलवे परियोजनाओं के लागत में 50 प्रतिषत की हिस्सेदारी वहन करने पर जोर डाला जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित मुजफ्फरनगर-रूड़की रेलमार्ग की निर्माण  लागत भी शत्-प्रतिषत केन्द्र सरकार द्वारा वहन की जाये।

         डाॅ0 निषंक ने बताया कि वर्ष 2010-11 में हुई रिकार्ड अतिवृष्टि के कारण विगत 10 वर्षो में राज्य ने जो परिसंपत्तियां एवं अवस्थापना सुविधायें सृजित की थीं वह बड़ी संख्या में ध्वस्त हो गई हैं। इसके साथ ही भारी भू-स्खलन के कारण 200 से अधिक गांव विनाश के कगार पर आ गये हैं, जिन्हें समय रहते अन्यत्र बसाया जाना आवश्यक है। इन्हें पुनस्र्थापित करने में लगभग 21000 करोड रूपये का व्यय अनुमानित है। इस प्राकृतिक विभीषिका को दृष्टिगत रखते हुए क्षतिग्रस्त योजनाओं की शीघ्र पुनस्र्थापना हेतु विशेष सहायता पैकेज दिया जाय।

         मुख्यमंत्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि उत्तराखण्ड को विशेष केन्द्रीय सहायता ;ैब्।द्ध के रूप में 60 करोड़ रुपए तथा विशेष आयोजनागत सहायता ;ैच्।द्ध में 300 करोड़ रुपए ही आबंटित हुए। उन्होंने इस मामले में भी अपने राज्य को हिमाचल की भांति ही विशेष केन्द्रीय सहायता एवं विशेष आयोजनागत सहायता स्वीकृत करने की मांग की। उन्हांेने आगे कहा कि उत्तराखण्ड में लगभग 65 प्रतिशत भू-भाग वनाच्छादित है तथा मात्र 13 प्रतिशत भूमि कृषि के अन्तर्गत है। वन क्षेत्र की अधिकता के कारण विभिन्न विकास गतिविधियों को संचालित करने में अनेक बाधायें उत्पन्न होती हैं। उत्तराखण्डवासियों का वनों के विकास में जन सहभागिता करते हुए राज्य में 12089 वन पंचायतें गठित की है तथा राज्य गठन के उपरान्त वनाच्छादित क्षेत्रफल में 1141 वर्ग कि0मी0 क्षेत्रफल की वृद्धि हुई है। हाल में सम्पन्न बाघ गणना में राज्य में बाघों की संख्या में भी वृद्धि हुई है, जबकि अन्य प्रदेशों में स्थिति भिन्न है फिर भी वन्य जीव संरक्षण हेतु उत्तराखण्ड को केन्द्र से संरक्षण, संवर्द्धन तथा सहायता के साथ ही जो विषेष दर्जा दिया जाना चाहिए वह अभी तक अप्राप्त है। 
मुख्यमंत्री डाॅ0 निषंक ने जोर देकर कहा कि योजना आयोग, भारत सरकार द्वारा तैयार की गयी पर्यावरण रिपोर्ट में उत्तराखण्ड को पर्यावरणीय सेवाओं के संरक्षण के लिए देश के सभी राज्यों में प्रथम स्थान पर रखा गया है जिससे इस राज्य द्वारा किये जा रहे प्रयासों की पुष्टि होती है। इसके विपरीत वन संरक्षण अधिनियम एवं पर्यावरण सरंक्षण से सम्बन्धित विभिन्न नियमों का बोझ केवल इसी राज्य की जनता पर अनावष्यक रुप से डाला जा रहा है जिससे विकास कार्य अवरूद्ध हो रहे है।
 डाॅ0 निषंक ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य द्वारा दी जा रही प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से जीवनदायी पर्यावरणीय सेवाओं को वैज्ञानिक विधि से विभिन्न संस्थाओं द्वारा आंकलन किया गया है। इनके अनुसार राज्य द्वारा लगभग 35000 से 40000 करोड़ रुपए मूल्य की पारिस्थितिकीय सेवायें प्रतिवर्ष दी जानी आंकी गई है, जिनका लाभ देश ही नहीं अपितु विश्व को मिल रहा है। किन्तु इस पर्यावरण संरक्षण योगदान एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण सेवा के एवज में राज्य को किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति नहीं की जा रही है। साथ ही उत्तराखण्ड के नदी नालों से रेता-बजरी चुगान पर भी केन्द्र द्वारा प्रतिबन्ध लगाया गया जबकि इस प्रकार का चुगान नदी नालों को नियंत्रित करने में सहायक होता है। अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री डाॅ. निषंक ने प्राकृतिक वन सम्पदा के संरक्षण के लिए उत्तराखण्ड राज्य को प्रोत्साहन स्वरूप ग्रीन बोनस के रूप में प्रतिवर्ष 1000 करोड़ रूपये का विशेष पैकेज स्वीकृत करने की भी मांग की।

        योजना आयोग के सम्मुख उत्तराखण्ड को प्रदत्त विशेष औद्योगिक पैकेज की अवधि 2013 से घटाकर मार्च 2010 में ही समाप्त करने का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इसके कारण राज्य में निवेषित धनराषि एवं लगभग दो लाख चैसठ हजार व्यक्तियों का रोजगार गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य में औद्योगिक तथा निवेष का वातावरण कायम रखने के लिए विषेष औद्योगिक सहायता पैकेज को पुनर्जीवित कर वर्ष 2020 तक बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लम्बी अवधि से विकसित राज्यों की शैशवस्था से गुजर रहे पिछड़ेपन के आधार पर गठित राज्य उत्तराखण्ड अर्थात समान से असमान की तुलना करना कदापि उचित नहीं है।

      मुख्यमंत्री ने कहा कि सभी धर्मावलम्बियों के तीर्थों एवं धार्मिक स्थानों हेतु उत्तराखण्ड राज्य के प्रसिद्ध होने के कारण इस राज्य में असंख्य श्रद्धालुओं का आवागमन होता है और इनसे सम्बन्धित मूलभूत सुविधाओं, कानून व्यवस्था, सुरक्षा, पेयजल, स्वच्छता, चिकित्सा, यातायात, पार्किंग आदि व्यवस्थाओं हेतु योजना आयोग के स्तर उत्तराखण्ड को 500 करोड़ रुपए की सहायता दिये जाने पर विचार किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने केन्द्र सरकार द्वारा राज्य की अनेक निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक के कारण राज्य सरकार को हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति की मांग करते हुए ऐसे अवसरों की क्षतिपूर्ति के साथ ही 2000 मेगावाट विद्युत केन्द्रीय पूल से निःशुल्क उपलब्ध कराने की मांग भी की। उन्होंने उत्तराखण्ड के नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्रोतों के सूखने के कारण सदानीरा नदियों से पंम्पिंग योजनाओं के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराने के लिये निमार्णाधीन पम्पिंग योजनाओं को पूर्ण करने के लिए 500 करोड़ रुपए की विशेष केन्द्रीय सहायता पृथक से स्वीकृत किये जाने का अनुरोध किया।

मुख्यमंत्री डाॅ0 निशंक ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य के विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में अतिवृष्टि, भू-स्खलन से मोटर मार्गों का अवरूद्ध होना एवं सड़क दुर्घटनाओं से तत्काल निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा राज्य को दैवी आपदा राहत के लिए प्रतिवर्ष विशेष पैकेज के रूप में आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। उन्होने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य के पूर्व सैनिकों के कल्याण एवं उन्हें पुनः सेवायोजित करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा एक विशेष कार्ययोजना के तहत उत्तराखण्ड को एक अलग से पैकेज दिया जाना अपेक्षित है।मुख्यमंत्री डाॅ0 निषंक ने कहा कि वर्तमान में राज्य में प्राथमिक शिक्षा में नामांकन के सापेक्ष उच्च शिक्षा में नामांकन दर 10 प्रतिशत के लगभग है। मानक दर 33 प्रतिशत करने हेतु उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अवस्थापना सुविधाओं को सुदृढ़ किया जाना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु राज्य सरकार को केन्द्रीय सहायता की आवश्यकता है। उन्होने कहा कि राज्य की जटिल भोैगोलिक परिस्थितियों तथा वन विभाग से अनापत्ति लेने में होने वाले विलम्ब से बचने हेतु अनुरोध किया कि मुख्य वन संरक्षक, केन्द्रीय क्षेत्र को 10 हैक्टेयर की जगह 20 हैक्टेयर वन भूमि के स्थानान्तरण करने का अधिकार अनुमन्य किया जाये। मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम (मनरेगा) के प्रभावी एवं बेहतर प्रबन्धन के लिए इसके अन्तर्गत प्रषासनिक व्यय 6 प्रतिषत से बढ़ाकर 10 प्रतिषत किया जाना चाहिए। धनराषि अनेक किस्तों की बजाय दो किस्तों में जारी की जानी चाहिए। समाज के कमजोर वर्गों की माँग को ध्यान में रखते हुए 100 दिवसों के रोजगार की बजाय कम से कम 120 दिवसों का रोजगार दिया जाना चाहिए तथा परियोजना के अन्तर्गत सामग्री ;डंजमतपंसद्ध अंष को 40 प्रतिषत से बढ़ाकर 50 प्रतिषत किये जाने की आवष्यकता है। उन्होंने कहा कि त्वरित ऊर्जा विकास एवं सुधार परियोजना ;।च्क्त्च्द्ध के अन्तर्गत वर्तमान में 10 हजार से अधिक जनसंख्या के 31 नगर आच्छादित है। भारत सरकार से अनुरोध है कि राज्य की विरल जनसंख्या एवं छोटे कस्बों की बहुतायत को देखते हुए इस परियोजना के चयन हेतु जनसंख्या के मानक को 10 हजार से घटाकर 5 हजार किया जाय।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह वर्ष 11वीं पंचवर्षीय योजना का अन्तिम वर्ष है तथा आपके मार्गदर्शन में 12वीं पंचवर्षीय योजना का कार्य चल रहा है। अतः यह उचित अवसर होगा कि हमारे राज्य द्वारा अनुभूत समस्याओं का समुचित निराकरण किया जाय। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा बीपीएल परिवारों की लड़कियों की षिक्षा के लिए ‘‘गौरा देवी कन्या धन योजना’’ व गांवों के समग्र विकास के लिए प्रत्येक न्याय पंचायत में से एक ग्राम का चयन कर 670 ग्रामों में ‘‘अटल आदर्ष ग्राम योजना’’ प्रारम्भ की गई है। इसके अलावा राज्य के महत्वपूर्ण पर्यटक स्थलों को यातायात सुविधाओं से जोड़ने के विशेष प्रयास किये जा रहें हैं। इसके लिए सड़क निर्माण, रज्जु मार्गों का निर्माण, हैलीपैड्स की स्थापना तथा राज्य के हवाई-अड्डों के विस्तारीकरण पर जोर दिया जा रहा है ताकि उच्च आय-वर्ग के पर्यटक राज्य की ओर आकर्षित हो सकंे। उन्होंने कहा कि राज्य में 73वें संविधान संशोधन विधेयक के प्रावधानों के अनुरूप जनपद स्तरीय जिला नियोजन समितियों का गठन किया जा चुका है तथा चयनित प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर दी गई है।

      डाॅ0 निषंक ने कहा कि वाह्य सहायतित परियोजनाओं, संसाधन आधारित केन्द्र पोषित योजनाओं, अन्य केन्द्रीय योजनाओं के राज्यांश की व्यवस्था, एवं जिला नियोजन समितियों द्वारा अनुमोदित योजनावार परिव्यय को सम्मिलित करते हुये राज्य संसाधन आधारित परिव्यय  6200 करोड़ रूपए के (प्रस्तावित) सापेक्ष लगभग 4136.45 करोड़ रूपए का परिव्यय वचनबद्ध मदों में प्रस्तावित है। अतः राज्य सेक्टर, जिसके अन्तर्गत क्षेत्रीय आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु अतिमहत्वपूर्ण अवस्थापना एवं सामाजिक क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करना होता है, उसके लिये थ्सवंजपदह परिव्यय अत्यधिक कम रह जाता है। अतः वार्षिक योजना पर अन्तिम अनुमोदन के समय इस बिन्दु पर विचार किया जाना चाहिए।

 

Monday, April 11, 2011

लाखों के जीवन रक्षक उपकरण बने शो-पीस।



रूद्रपुर के चिकित्सालय में मशीनों में लगी जंग।

नारायण परगांई। देहरादून। सरकारी अस्पातालों में जीवन रक्षक उपकराणों की उपयोग ना हो पाने के चलते हजारो मरीजों को इसका लाभ नही मिल पा रहा। कांग्रेस शासन काल में खरीदे गए उपकराणों के कारण 1355 मरीजो को चिकित्सा सुविधाओ का लाभ नही मिल पाया जिस कारण दूसरे स्थानो पर जाकर अपना इलाज करवाना पड़ा यही नही अप्रैल 2006 से जुलाई 2009 तक मरीजों को दूर दराज इलाज कराने में भारी परेशानियों का सामना भी करना पड़ा। मशीनो ंका संचालन ना हो पाने के कारण नौ श्रेणियों की 12 जीवन रक्षक मशीनें 3 वर्ष की वारंटी समाप्त होने के चलते सरकार को करीब 85 लाख की लागत देनेके बाद भी मरीजो को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नही हो सकी। सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 85 लाख की जीवन रक्षक उपकरणों का 4 साल से अधिक समय तक उपयोग ना होने के कारण रोगियों को इसका लाभ नही मिल सका जबकि वर्ष 2002 एवं 03 में सरकार ने चिकित्सा प्र्रबन्ध समीति का गठन किया था जिसका उद्देश्य सरकार से प्राप्त उपकरणों का रखरखाव एवं संचालन करना था। इतना ही नही प्रत्येक 3 माह में एक बार बैठक आयोजित कर पैरामैडिकल स्टाफ की नियुक्ति तथा संविदा पर सेवाओ का प्रबन्ध करने के साथ साथ चिकित्सक व कर्मचारियों के लिए कार्यशालाओ का आयोजन भी करना था लेकिन मुख्यचिकित्सा अधीक्षक जवाहरलाल नेहरू जिला चिकित्सालय रूद्रपुर के कार्यालय की अगस्त 2009 की लेखा परीक्षा के दौरान यह पाया गया कि 85 लाख की 12 जीवन रक्षक मशीने दिसम्बर 2005 से मई 2006 के बीच चिकित्सालय को आपूर्ति की गई थी लेकिन उपकरणो को ना तो स्थापित किया गया और ना ही इनका संचालन किया गया जिस कारण मई 2010 तक चिकित्सालय में यह मशीने बिना उपयोग के ही पड़ी हुई थी यहां तक कि संविदा पर कर्मचारियो व मैडिकल सटाफ को लेने तक कि कोशिश नही की गई और विशेषज्ञों की नियुक्ति भी ना होने के व चलते इन सेवाओ का लाभ मरीजों को नही मिल सका। रिपोर्ट में गठन के उद्दश्यों की अनदेखी करने एवं सरकार के निर्देशों की अवहेलना करने के फलस्वरूप सामान्य जनता को 85 लाख की जीवन रक्षक मशीनो के उपलब्ध होने के बाद भी इसका लाभ नही मिल सका। जबकि मशीनोे के उपयोग ना करने के कारण परिचालन की स्थिति समय व्यतीत होने के साथ साथ वारंटी अवधि समाप्त हो जाने के कारण खराब हो रही थी। दिसम्बर 2009 में मुख्य चिकित्सक ने स्वीकार किया कि जगह की कमी तकनिशियनों की कमी के कारण उपकरणोे की स्थापना नही की जा सकी। और अध्यक्ष सहित सभी सदस्यों की एक साथ उपलब्धता ना होने कारण बैठक भी संचालित नही की जा सकी प्रबंधन के उदासीन रवैये के कारण निष्क्रिय पड़े उपकरणें से उद्देश्यों की पूर्ति नही हो सकी जिस कारण उपकरणोे से मरीज लाभान्वित नही हुए। उपप्रकरण शासन को मई 2010 में भेजा गया था जिस पर अभी तक कोई कार्यवाही नही हो पायी है। कुल मिलाकर लाखों रूपये के खरीदे गए उपकरणो का लाभ रूद्रपुर की जनता को नही मिल पाया है। अधिकारियो की लापरवाही के कारण जहां सरकार के पैसे का नुकसान हुआ हेै वही चिकित्सा विभाग भी इसे सुचारू करने में फिसड्डी साबित हुआ है। इस बारे में जब रूद्रपुर के सीएमएस जे सी दुर्गापाल से बात की गई तो साफ कहना था कि स्टाफ की नियुक्ति ना हो पाने के कारण मशीनों ा संचालन नही हो पा रहा है और पूरा मामला शासन के संज्ञान में है।

Wednesday, February 23, 2011

‘योग्य’ मान रहे योग गुरु बाबा रामदेव



राजनीति में स्थापित होने को आतुर बाबा रामदेव काला धन, भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों पर बयानबाजी के जरिए राजनीतिक गलियारों में चर्चित तो हो रहे हैं लेकिन इससे योग गुरु के रूप में स्थापित उनकी प्रतिष्ठा को खासा आघात पहुंच रहा है। आज देश की जो राजनीतिक स्थिति है उसमें वह कोई बड़ा बदलाव कर पाएंगे इसमें शंका ही है क्योंकि पूर्व में उनसे भी बड़े दो संत करपात्रीजी महाराज और बाबा जयगुरुदेव ऐसा करने के प्रयास में अपना सब कुछ गंवा चुके हैं। इतिहास गवाह है कि जिन संतों और साधुओं ने राजनीति में प्रवेश किया उन्हें क्षणिक सत्ता सुख भले मिल गया हो लेकिन संत के रूप में कमाई गई उनकी इज्जत कम हो गई। राजनीतिक पार्टियों ने साधु संतों का इस्तेमाल कर उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। चाहे स्वामी चिन्मयानंद हों, रामविलास वेदांती हों, योगी आदित्यनाथ हों अथवा सतपाल महाराज। इन सभी ने जब राजनीति में प्रवेश नहीं किया था तो जनता की इनमें आस्था थी लेकिन राजनीति में कदम रखते ही यह भी अन्य राजनीतिज्ञों की तरह हो गये जिससे इनके प्रति लोगों में विश्वास कम हुआ। जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि राजनीति में प्रवेश की बजाय संतों और धर्मात्मा लोगों को सामाजिक क्षेत्र में ही सक्रिय रहना चाहिए, राजनीति में उनका मार्गदर्शन जरूर रहे लेकिन वह नेतृत्व करने से बचें तो ज्यादा सही रहेगा।

राजनीति के लिए अपने को ‘योग्य’ मान रहे योग गुरु बाबा रामदेव राजनीतिक दावपेंचों को भी प्राणायाम तथा कपालभाति की तरह सरल मानकर जिस राह पर चलने का प्रयास कर रहे हैं वह अंततः उनको अपयश ही प्रदान करेगी। रामदेव ने देश की राजनीति में शुद्धता लाने के लिए ऐलान किया है कि वह लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों में साफ छवि वाले लोगों को अपनी पार्टी के टिकट पर चुनावी मैदान में उतारेंगे। इसके लिए बाबा ने बाकायदा अपने योग प्रशिक्षण शिविरों में योग शिक्षा के साथ-साथ राजनीतिक प्रवचन भी देने शुरू कर दिए हैं। इन प्रवचनों में अकसर निशाना नेहरू-गांधी परिवार होता है। इसी कारण रामदेव अब सीधे कांग्रेस के निशाने पर आ गये हैं। वह जिस काला धन के मुद्दे पर सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे हैं अब वही मुद्दा उनके गले की फांस बन गया है और कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह ने रामदेव से कहा है कि उन्हें अपने ट्रस्ट, आश्रम और अपनी संपत्तियों की अपार वृद्धि के बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए।

बहुत तेजी से अरबों रुपए की संपत्ति के स्वामी बने रामदेव हालांकि यह कहते हैं कि उनकी कोई निजी संपत्ति नहीं है। लेकिन यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि उनका दिव्य योग ट्रस्ट सालाना करोड़ों रुपए कमा रहा है। 2007 में तहलका पत्रिका ने गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट को आधार बनाते हुए यह खुलासा कर सभी को चैंका दिया था कि रामदेव की सालाना आमदनी 400 करोड़ रुपए है। वैसे यह आमदनी हो भी क्यों न? आखिर रामदेव अपने योग शिविर में टिकट लगाते हैं जिसकी एवज में उन्हें कोई कर भी नहीं देना होता। साथ ही उनकी दिव्य फार्मेसी विभिन्न औषधियों का निर्माण कर भी भारी मुनाफा अर्जित करती है। यही नहीं मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कुछ टीवी चैनलों में भी बाबा रामदेव की कथित हिस्सेदारी बताई जाती है। रामदेव के हरिद्वार स्थित आश्रम में भी किसी का मुफ्त इलाज नहीं होता और इसके लिए लोगों को हजारों रुपए में शुल्क अदा करना पड़ता है। बाबा रामदेव पर कई राज्यों में मूल्यवान जमीन कौड़ियों के भाव लेने के आरोप भी लगते रहे हैं। यही नहीं बाबा के पास स्काॅटलेंड में एक आइसलेंड भी बताया जाता है जिसकी कीमत 2 मिलिय्ान पौंड है।

पंूजीपतियों का विरोध करने वाले रामदेव अप्रत्यक्ष रूप से खुद भी पूंजीपति ही हैं। यह सही है कि उन्होंने योग को देश-विदेश में विख्यात कर लोगों के इससे होने वाले लाभ से परिचित कराया लेकिन यह भी सही है कि रामदेव ने योग की मार्केटिंग कर खुद को नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया। योग गुरु के रूप में देश विदेश में विख्यात हुए रामदेव जल्द ही ऐसे व्यक्ति बन गए जिसके एक इशारे पर दर्जनों मुख्यमंत्री उनके कार्यक्रम में शरीक होने लगे साथ ही अपने शिविरों में उमड़ती भीड़ की संख्या देखकर वे इतने गदगद हुए कि उन्हें योग सीखने आने वाले लोगों के रूप में वोटर दिखाई देने लगे और बाबा के मन में राजनीति में आने की इच्छा जागी। समस्याएं कहां नहीं होतीं? भारत में भी हैं, उन्हीं का हवाला देते हुए रामदेव ने लोगों को अपने राजनीतिक विचारों से अवगत कराना शुरू कर दिया। जिससे कांग्रेसी मुख्यमंत्री उनसे दूर हुए साथ ही भाजपा ने भी उन्हें अपने लिए खतरा जान उनसे दूरी बनानी शुरू कर दी। क्षेत्रीय और वामपंथी दल वैसे भी उन्हें ज्यादा महत्व नहीं देते इसलिए रामदेव ने अपना ही राजनीतिक दल बनाने की सोची और आज ऐसा कर वे किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूकते।

लेकिन रामदेव शायद भूल गए हैं कि उनके पास जो भीड़ जुट रही है वह दरअसल उनके वोटर नहीं बल्कि अपने स्वास्थ्य लाभ के लिए आए लोग हैं जो शायद ही उनके राजनीतिक विचारों से इत्तेफाक रखते हों। यदि जुटने वाली भीड़ संबंधित व्यक्ति के पक्ष में वोट डालती तो शायद ही कोई नेता चुनाव हारता। कल को कोई डाॅक्टर भी अपने यहां जुटने वाली भीड़ की संख्या देख कर चुनावों में उतरने का फैसला ले ले तो इसे सरासर बेवकूफी ही कहा जाएगा। रामदेव चाहे जितने बड़े योग गुरु हों लेकिन उनका राजनीतिक आधार कुछ भी नहीं है। यदि उन्होंने योग को लोकप्रिय बनाने की बजाए अब तक की अपनी मेहनत राजनीति के क्षेत्र में लगाई होती तो शायद उनका कुछ जनाधार हो भी जाता। उन्हें भाजपा से जुड़े संतों के राजनीतिक हश्र पर भी निगाह घुमा लेनी चाहिए।

यदि रामदेव हिन्दू वोटों के सहारे अपना बेड़ा पार लगाना चाहते हैं तो उन्हें यह भी देख लेना चाहिए कि यह नीति तो अथक प्रयासों के बाद भाजपा की भी सफल नहीं रही ऐसे में वह तो राजनीति के क्षेत्र में नौसखिया ही हैं। राजनीति का क्षेत्र रामदेव जी के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि यहां एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप में जिस भाषा का इस्तेमाल किया जाता है, वह उनके जैसे प्रबुद्ध और लोकप्रिय भारतीय नागरिक के लिए कष्टदायी होगा। राजनीति का क्षेत्र काजल की कोठरी है, यह बात उन्हें अब तक समझ आ ही गई होगी क्योंकि रामदेव का दामन भले कितना साफ हो लेकिन यहां मुख्यधारा में प्रवेश करने के साथ ही वह भी आरोपों के घेरे में आ गए हैं जिससे उनकी साफ छवि पर भी सवालिया निशान लग गया है। इसके अलावा हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में एक कांग्रेस सांसद ने कथित तौर पर उन्हें सार्वजनिक रूप से अपशब्द कहे।

कुछ समय पहले मीडिया में रामदेव के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने की खबर भी चली थी। लेकिन रामकिशन यादव उर्फ रामदेव यदि यह सपना ले भी रहे हैं तो जनता जानना चाहेगी कि किस आधार पर? सामाजिक क्षेत्र में, उन्होंने यह सही है कि लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने में बड़ी भूमिका निभाई लेकिन इसके लिए उन्होंने फीस भी वसूली। अध्यात्म के क्षेत्र में उनका कोई योगदान नहीं है। राजनीति के क्षेत्र में वह बिल्कुल नए हैं और शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की शैक्षणिक योग्यता के आगे कहीं नहीं टिकते। मनमोहन सिंह के पास जहां देश विदेश की कई डिग्रियां हैं वहीं रामदेव ने हरियाणा के एक गांव स्थित स्कूल में आठवीं तक की कक्षा पास की और उसके बाद एक गुरुकुल में योग और संस्कृत की शिक्षा ली।

Monday, February 21, 2011

पुलिस में गुटबाजी से बदमाशों के हौसले बुलंद

पुलिस में गुटबाजी से बदमाशों के हौसले बुलंद




देहरादून।



राजधनी दून में पुलिस बदमाशों को पकडने के बजाए गुटबाजी में उलझती जा रही है। जिस कारण आम जनता पुलिस के दरबार में अपनी पफरियाद सुनाती हुई नजर आ रही है पिछले कापफी समय से राजधनी दून में गुटबाजी की मार झेल रही पुलिस बदमाशों को पूरी तरह खूली छूट दे रही है गुटबाजी के कारण ही एक दूसरे को नीचा दिखाने के चलते बदमाशों के हौसले भी बढ़ते नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों राजधनी दून में हुए शूटआउट के पीछे भी पुलिस की गुटबाजी भी देखने को मिली। अपने-अपने थाना क्षेत्रों में अपराधें को रोकने के बजाए पुलिस के दरोगा व कई बडे़ अध्किारी जहां पूरी तरह विपफल साबित हुए हैं वहीं कई मामलों में पुलिस के आला अध्किारियों तक को हस्ताक्षेप करना पड़ा है। बडे़ अध्किारियों के हस्ताक्षेप करने के बाद यह बात भी उजागर हो गई है कि पुलिस के दरोगा अपनी कार्य प्रणाली ठीक ढंग से नहीं निभा पा रहे हैं। जिसके चलते थाना क्षेत्रों में जनता को मिलने वाला न्याय भी पफरियाद लेकर आने वाले पफरियादी को नहीं मिल पा रहा है। एक तरपफ तो पुलिस मित्राता सुरक्षा का दावा करती हुई नजर आती है वहीं दूसरी तरपफ पुलिस के कई दरोगा थाना क्षेत्रों से ही मामलों को रपफा-दपफा करने का खेल खेलते नजर आ रहे हैं।

बीती रात थाना डालनवाला क्षेत्रा के अन्तर्गत सचिवालय के ठीक सामने हुई मारपीट व कातिलाना हमले में आध दर्जन लोगों ने एक व्यक्ति को चाकू व अन्य हथियारों से मौत के घाट उतारने का प्रयास किया लेकिन मौके पर पहुंची पुलिस ने उन्हें पकडने के बजाए रपफा-दपफा कर डाला। मौके से एक व्यक्ति को ही पकड़ कर थाना डालनवाला ले जाया गया लेकिन उसके अन्य साथियों को पुलिस नहीं पकड़ सकी जबकि करनपुर चैकी इंचार्ज उसके अन्य साथियों को पकडने के लिए उस स्थान पर गये थे जहां वे रूके हुए थे। लेकिन पुलिस उन्हें पकडने का साहस इसलिए नहीं जुटा सकी क्योंकि इस मामले में एक साहब की संलिप्ता मौजूद थी और साहब का लगातार थाना डालनवाला इंस्पेक्टर को पफोन पर आरोपियों को न पकडने की बात कहता रहा। अति संवेदनशील माने जाने वाले सचिवालय व पुलिस मुख्यालय के पास घटी घटना ने यह बात साबित कर दी की पुलिस के कुछ लोग इस तरह की घटनाओं को थाने से ही रपफा-दपफा करने का खेल खेलते नजर आ रहे हैं।



एक तरपफ तो पीड़ित को न्याय दिलाने की बात की जाती है लेकिन पुलिस के यह दावे पूरी तरह खोखले नजर आ रहे हैं। लगातार बढ़ रही इन घटनाओं में पुलिस हियूमन राईट्स का भी खुला उल्लंघन किया जा रहा है अगर प्रदेश में पुलिस से हियूमन राईट्स के बारे में जानकारी ली जाये तो चंद लोगों को ही इस बारे में बारिकी ज्ञान होगा। बदमाशों पर नकेल कसने की बात कहने वाले पुलिस के आला अध्किारी अब पूरी तरह खामोश होकर बैठ गये हैं और गुटबाजी का खेल इस तरह खेला जा रहा है जिससे पुलिस की छवि आपस में ही दागदार बन बैठी है। यहां तक की एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए आपस में ही मनमुटाव की बाते भी बढ़ती जा रही है जो उत्तराखण्ड की मित्रा पुलिस के लिए ठीक संकेत नहीं है। अगर समय रहते इस गुटबाजी को नहीं रोका गया तो बदमाश कुछ पुलिस अध्किारियों से सैटिंग कर सरेआम खूनी होली खेलते नजर आयेंगे।

पुलिस की कब्र खोदने की तैयारी!

पुलिस की कब्र खोदने की तैयारी!




देहरादून।



उत्तराखण्ड शासन के कुछ अध्किारी पूरे पुलिस विभाग की कब्र खोदने की तैयारी में जुट गये हैं वह पुलिस अध्किारियों के बीच नपफरत का जो बीज बोने के मिशन में लगे हुए हैं अगर उस मिशन को उत्तर प्रदेश की तर्ज पर इस राज्य में अंजाम दे दिया गया तो पुलिस विभाग में विद्रोह की आग कभी भी भड़क उठेगी जिसकी लपटों से पूरा पुलिस महकमा सुलग जायेगा। सवाल उठ रहा है कि नये व पुराने पुलिस कप्तानों से जिस तरह बडे जिले छीनकर उनके स्थान पर डीआईजी स्तर के अधिकारियों को बिठाने का तानाबाना बुना जा रहा है वह राज्य में बगावत की चिंगारी सुलगाने की तरपफ इशारा करता है। नये व पुराने आईपीएस अब शासन के होने वाले निर्णय पर अपनी निगाहें जमाये हुए हैं।

उल्लेखनीय है कि शासन के कुछ अध्किारी प्रदेश पुलिस की कब्र खोदने के लिए ऐसी योजना बनाने के मिशन में जुटे हुए हैं जिससे कि पुलिस महकमें में कभी भी विद्रोह की ज्वाला भड़क सकती है। देखने में आ रहा है कि जब से कुछ बडे जिलो में रैंकर आईपीएस अध्किारियेां की तैनाती हुई है वह शासन के कुछ अध्किारियों की आंखों में लगातार खटक रही है। इसी के चलते उन्होंने इन बडे जिलों से रैंकर आईपीएस अध्किारियेां को हटवाने के लिए गुप्त रूप से तानाबाना बुन लिया है इसी कडी के चलते उन्होंने यह योजना तैयार की है कि तीन बडे जिलों, दून, हरिद्वार व उध्मसिंह नगर में डीआईजी रैंक के अध्किारियेां को तैनाती दे दी जाये। इस योजना को जो चंद अधिकारी अमलीजामा पहनाने के मिशन में लगे हुए हैं वह इस छोटे से राज्य के लिए कापफी घातक हो सकता है। शासन के यह चंद अध्किारी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखण्ड में भी कुछ बडे जिलों केा डीआईजी के हवाले करने का जो तानाबाना बुन रहे हैं उससे पुलिस के छोटे अध्किारियों में एक विद्रोह की भावना देखने केा अभी से मिलने लगी है। भले ही यह योजना अभी कागजों में चल रही हो लेकिन जिस तेजी के साथ इस योजना का पूरे राज्य के अन्दर प्रचार हुआ है वह कहीं न कहीं पुलिस विभाग की कब्र खेादने की तैयारी की ओर इशारा कर रहा है। पुलिस महकमें में यहां तक चर्चाएं हैं कि दून में संजय गुज्याल को डीआईजी के पद पर आसीन करने की कवायद की जा रही है तथा अब तक एसटीएपफ में एसएसपी के पद पर तैनात रहे डीआईजी अमित सिन्हा को हरिद्वार का डीआईजी बनाये जाने पर भी तेजी से मंथन शासन में बैठे कुछ अध्किारी करने में लगे हुए हैं। वहीं कई जिलों में पुलिस कप्तान की बागडोर संभाल चुके डीआईजी अभिनव कुमार को उध्मसिंह नगर का डीआईजी बनाये जाने के लिए भी मंथन शासन में बैठे चंद अध्किारी करने में जुटे हुए हैं। हालांकि अभी इस बात की भनक नहंी लग पाई है कि जिन अध्किारियेां को बडे जिलों में डीआईजी के पद पर भेजने के लिए मंथन चल रहा है उन्होंने शासन में बैठे कुछ अध्किारियों की इस कार्यवाही का समर्थन किया है या नहीं?



शासन में बैठे कुछ अध्किारी जिस तरह से पुराने व नये आईपीएसों के साथ भेदभाव करने का खाका तैयार करने में जुटे हुए हैं वह इस राज्य के लिए कापफी खतरनाक साबित हो सकता है। राज्य में आये कुछ नये आईपीएस व रैंेकर पुलिस कप्तानों में इस योजना को लेकर हालांकि अभी विद्रोह की भावना देखने को नहंी मिल रही है लेकिन पीपीएस रैंक के कई अध्किारियेां का सापफ कहना है कि अगर इस राज्य में एसएसपी के स्थान पर डीआईजी को जनपदों में तैनात करना है तो प्रदेश के सभी पीपीएस अध्किारियों को बर्खास्त करके घर भेज देना चाहिए क्योंकि जिस तरह से इस राज्य में उत्तर प्रदेश की परिपार्टी अपनाने के लिए शासन के कुछ अध्किारी खेल खेलने के मिशन में जुटे हुए हैं उन्होंने अगर अपनी इस योजना को अमलीजामा पहनाने का सपना पूरा किया तो यह तय है कि वह भी किसी कीमत पर चुप बैठने वाले नहीं हैं। पुलिस मुख्यालय में बैठे कुछ बडे अधिकारियेां का कहना है कि शासन के जो चंद अध्किारी बडे जिलों में डीआईजी को बैठाने के लिए रणनीति बना रहे हैं उससे आने वाले समय में पुलिस के अन्दर विद्रोह की चिंगारी भड़क जायेगी जो कि इस शांतप्रिय प्रदेश के लिए खतरनाक साबित होगी।

09837261570

Saturday, February 12, 2011

कंग्रेस के विभीशण तिवारी ने भाजपा को दिए गुरूमंत्र


भाजपाई रैली में तिवारी की मौजूदगी से कांग्रेसी धराषाही

नारायण परगांई
 देहरादून। नितिन गडकरी की रैली से षुरू हुआ भाजपा का चुनावी श्रीगणेष कांग्रेस के विभीशण कहे जाने वाले तिवारी की मौजूदगी से राजनैतिक गति पकड़ गया है। तिवारी की भाजपा की रैली में मौजूदगी ने जहां प्रदेष की राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया है वहीं कांग्रेसी एनडी तिवारी की इस हरकत से सकते में आ गए हैं। आगामी विधनसभा चुनाव को देखते हुए तिवारी के इस कदम को कांग्रेस के लिए  बेहद खतरनाक माना जा रहा है। प्रदेष के विकास पुरूश कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्राी एनडी तिवारी ने बीते दिवस देहरादून के गांध्ी पार्क में भाजपा की अटल खाद्यान योजना को देष के लिए अच्छा कदम बताने के साथ-साथ इसे उत्तराखंडके लिए भी महत्वपूर्ण बताने की बात खुले मंच से भाजपा के हजारों कार्यकर्ताओं के बीच कह डाली थी जिसे सुनकर प्रदेष भर के कांग्रेसी नेताओं में हड़कंप मच गया था। यहां तक की प्रदेष की मौजूजा भाजपा सरकार की खुलकर तारीफ करने के बाद खुद भाजपा के राश्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी तिवारी की तारीफ खुले मंच से कर डाली। राजनैतिक हलकों में यह बातें जहां चार्चा का विशय बनी हुई हैं वहीं काग्रेसी नेताओं की नींद भी उड़ गई है। पिछले काफी समय से राज्यपाल पद पर बने रहने के दौरान सैक्स स्कैंडल में नाम सामने आने पर तिवारी से कांग्रेस ने पूरी तरह किनारा कर लिया था। और तभी से तिवारी कांग्रेस में असहज महसूस कर रहे थे। यहां तक की दिल्ली हाई कमान तक ने तिवारी की बात को अनसुना करते हुए उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया था। और राज्यपाल पद से इस्तीपफा देने के बाद तिवारी देहरादून का रूख कर गए थे। जिसके बाद से ही तिवारी अपने को कांग्रेस में असहज महसूस कर रहे थे। पितृत्व मामले में कोर्ट में दाखिल याचिका को लेकर भी तिवारी कांग्रेस से खासे नाराज चल रहे हैं। कोर्ट में तिवारी की डीएनए टेस्ट ना कराने की याचिका को भी खारिज कर दिया गया है। और अब तिवारी के उपर डीएनएटेस्ट कराने की तलवार भी लटकी पड़ी है। उत्तराखंड की राजनीति में तिवारी का कद बेहद उंचा माना जाता है। और तिवारी ने इस बात को पिछले हुए विधनसभा चुनाव में चुनाव प्रचार ना करके इस बात को सााबित भी किया जा चुका है। तिवारी के प्रचार ना करने से कांग्रेस को उत्तराखंड में सत्ता गंवाने का परिणाम भुगतना पड़ा था वहीं अब तिवारी के भाजपा की रैली में षामिल होने के बाद प्रदेष की राजनीति में नए समीकरण बनने तय हो गए हैं। तिवारी के भाजपा की रैली में आ जाने के बाद इसका नुकसान जहां कांग्रेस को 2012 के होने वाले विधनसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है वहीं भाजपा को इसका पफायदा मिलना तय माना जारहा है। तिवारी के अचानक भाजपा की रैली में पहुंचने के पीछे कांग्रेस को बैकपुट पर लाने की कवायद भी समझा जा रहा है लेकिन तिवारी के खास माने जाने वाले कांग्रेस प्रदेष अध्यक्ष यषपाल आर्या पर भी अगुलियां उठनी षुरू हो गई हैं। क्यिोंकि तिवारी को यषपाल आर्या मना पाने में पूरी तरह नाकामयाब षाबित हुए हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार भाजपा की रैली में षामिल होने के बाद तिवारी के आवास पर कई कांग्रेसी नेताओं ने डेरा जमा लिया था। लेकिन तिवारी ने सापफ तौर पर कांग्रेसी नेताओं को उनसे दूर रहने की हिदायत दी गई है। कुलमिलाकर उत्तराखंड की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाले तिवारी कांग्रेस में हासिए पर चल रहे हैं और नई जमीन तलासने की कवायद में लगे हुए हैं। अगर तिवारी ने भाजपा से हाथ मिला लिया तो उत्तराखंड की राजनीति में बहुत बड़ा परिवर्तन होना तय माना जा रहा है अपने मुख्यमंत्राी काल के अनुभव का लाभ वह जहां भाजपा को दे सकते हैं वहीं 2012 में पुनः सत्ता में भाजपा की वापसी का कदम भी तैयार कर सकते हैं। एक तरफ जहा भाजपा विकास को आधर बना कर चुनावी युद्ध् में कूद गई है वहीं गरीबों को सस्ता राषन उपलब्ध् कराने की योजना ने भी प्रदेष की गरीब जनता का रूझान भाजपा की ओर मोड़ दिया है। हांलाकि कई कांग्रेसी नेता इस महत्वपूर्ण योजना की आलोचना करते हुए देखे जा रहे हैं लेकिन गरीबजनता इस बातों की तरफ कोई प्रदेष की गरीब जनता का रूझान भाजपा की ओर मोड़ दिया है। हांलाकि कई कांग्रेसी नेता इस महत्वपूर्ण योजना की आलोचना करते हुए देखे जा रहे हैं लेकिन गरीबजनता इस बातों की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रही। कुलमिलाकर यह कहा जाए कि कांग्रेस के विभिशण ने भाजपा की रैली में जाकर कल्याणकारी राजा के कदमों को और अध्कि मजबूद कर दिया है। जिसका फायदा निष्चिित रूप् से भाजपा को मिलना तय है। 09837261570

Wednesday, February 9, 2011

विकास को लगेगे पंख, जनता की होगी बल्ले बल्ले।

डा निषंक अपने मुख्यमंत्री काल का तीसरा बजट करेंगे पेष।


नारायण परगांई। देहरादून। प्रदेष में विकास को पंख, जनता की समस्याओं को दूर करने का जज्बा, विकास की परिकल्पना, आदर्ष राज्य का सपना, और 2012 में पुनः सत्ता वापसी का चक्रव्यूह कुछ इसी तरह की कई बातों को लेकर प्रदेष के मुख्यमंत्री डा.रमेष पोखरियाल निषंक ने खाका तैयार कर अपना होमवर्क षुरू कर दिया है। महज तीन घंटे का विश्राम करने वाले सबसे युवा सीएम देष के लिए एक मिसाल बनने की ओर लगातार अग्रसर होते जा रहे हैं। इसके साथ ही प्रदेष में सबसे अधिक कैबिनेट बैठक कराने का श्रेय भी कुषल नेतृत्व के धनी डा़ निषंक को जाता है। यदि प्रदेष की जनता ने पुनः जन संदेष दिया तो उत्तराखण्ड को आदर्ष राज्य के रूप में देष के सामने प्रस्तुत करने का निषंक का सपना जरूर पूरा होगा। और राज्य की पहचान देष के सामने और अधिक विकसित व मजबूत होगी।

चुनावी साल होने के कारण जहां प्रदेष के मुख्यमंत्री अपने मुख्यमंत्री काल का वर्तमान सरकार का तीसरा बजट विधान सभा में पेष करेगे वही विपक्षी सवालों को भी कुंद कर डालेगे। प्रदेष में 16000 से भी अधिक राजस्व गांव मौजूद होने के बाद भी 11000 गांव को सड़क मार्ग से जोड़ा जा चुका है और षेश पांच से छः हजार गांव को 50 प्रतिषत स्वीकृती प्रदान कर दी गई हैं। इसके साथी ही ढाइ हजार से तीन हजार राजस्व गांव को अलग अलग योजनाओ से जोड़े जाने पर विचार चल रहा है। इन गांवों के सड़क मार्ग से जुड़ जाने के बाद जहां गांव पहुचने का रास्ता सुगम व जल्द पहुंचने का होगा वहीं क्षेत्र की जनता को भी इसका भरपूर लाभ मिलेगा। 500 से अधिक आबादी वाले गांव को जोड़े जाने काम पीएमवीआरआई योजना के साथ साथ अन्य योजनाओ के माध्यम से चल रहा है और 250 से कम आबादी वाले गावं को मुख्यमंत्री सड़क योजना एवं संयोजकता योजना के माध्यम से चिन्हित किया जा रहा है। वर्तमान में इन स्थानो पर सड़क निर्माण ना हो पाने कारण अधिक समय लगता है लेकिन यदि दूरस्त गांव में लघु पुलिया का निर्माण कर दिया जाए तो यहां पहुंचने में समय कम लगेगा। प्रदेष सरकार 250 से कम आबादी वाले गांव को सड़क मार्ग से जोड़ने पर युद्व स्तर पर काम कर रही है। और इसके साथ ही प्रदेष में दस रेलवे का्रसिंग के उपर ओवर ब्रिज बनाए जाने के प्रस्ताव भारत सरकार के रेल मंत्रालय को भेजे चुके हैं। इसके साथ ही हरिद्वार, रूड़की व डाट मंदिर के पास टर्नर बनाने का प्रस्ताव भी भेजा गया है। और नैषनल हाइवे का सूद्रीकरण एवं नवीनीकरण करने के लिए विषेश योजनाओ का आधीन 450 करोड़ की योजनाएं केंद्र सरकार का भेजी गई हैं। 250 से कम आबादी के असंयोजिक गांव के आंकड़ो अगर नजर दौड़ाई जाए तो गढ़वाल मंडल के पौढ़ी जनपद में सबसे अधिक 24 48 गांव की कुल संख्या है। जबकि कुमाउ मंडल के अल्मोड़ा जनपद में 1325 संख्या दूसरे नम्बर पर मौजूद है। इसके साथ ही 250 से कम आबादी के असंयोजित गांव को स्वीकृत मार्गाें से जोड़ा जा चुका है। जिसमें उत्तरकाषी में 88, देहरादून मेे 67, टिहरी में 181, पौढ़ी में 503, चमोली में 239, रूद्रप्रयाग में 101, पिथौरागढ़ में 253, चम्पावत में 90, अल्मोडत्रा मे 494, बागेष्वर में 231, नैनीताल में 56 है। इसके साथ ही प्रदेष सरकार अपने संसाधनों से झूलापुलों के निर्माण को भी अच्छा विकल्प मानकर चल रही है। षासन में बैठे सचिव उत्पल कुमार के अनुसार प्रदेष सरकार तेज गति से गांव को सड़क मार्ग से जोड़ने का काम कर रही है जिससे दूरस्त रहने वाले गांव मे ंपहुचने केलिए जो समय बरबाद होता है वो इनके सड़क मार्ग जुड़ जाने के बाद नही होगा उसके साथ ही इन क्षेत्रो में विकास के आयाम तेज गति से पहुचने षुरू हो जाएंगे उन्हांनं बताया कि केंद्र सरकार को कई नए प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं हजने स्वीकृत होने के बाद प्रदेष में विकास को नए पंख लगने षुरू हो जाएंगे।
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