Monday, February 8, 2010

संबल होते हैं मन के रिश्ते

जीवन की तेजी से बदलती परिभाषा और रिश्तों में बढ़ती दूरियाँ, कहीं न कहीं मनुष्य को मनुष्यता से ही दूर करने पर आमादा हैं। इसका खामियाजा सभी भुगत रहे हैं। कहीं टीनएजर्स शराब और सिगरेट जैसी लतों के गुलाम बन रहे हैं, कहीं पति-पत्नी के बीच की दूरियाँ बढ़ रही हैं और कहीं बच्चे मार्गदर्शन, स्वस्थ हँसी-मजाक और अच्छे घरेलू माहौल से दूर, केवल कृत्रिम दुनिया में कैद हैं।रिश्तों का 'हेल्दी बॉण्ड' तथा प्रसन्नता की ताजी हवा सबके लिए जरूरी है। यह आपके रिश्तेदारों, सहयोगियों, दोस्तों, किसी से भी मिल सकती है। जरूरत है आपके हाथ बढ़ाने की। पेशे से भवन निर्माता हीरेंद्र (48) पिछले दिनों एक बड़ी परेशानी से उबरे हैं। परेशानी की वजह थी उनके 18 वर्षीय पुत्र रौनक से जुड़ी। दरअसल घर से बाहर काम के सिलसिले में व्यस्त रहे हीरेंद्र इस ओर ध्यान नहीं दे पाए कि उनका बेटा बड़ा हो रहा है। उन्होंने केवल बेटे को महँगे तोहफे लाकर देना ही सबसे बड़ा काम समझ लिया। उनकी पत्नी भी बेटे का मन ठीक से पढ़ नहीं पाईं। उन्होंने अपने जीवन का टारगेट केवल बेटे को अच्छा भोजन करवाने तक सीमित कर लिया था। मिडिल क्लास तक आने पर तो रौनक के लिए भी पिता के दिए महँगे तोहफे खुश होने का सबब बनते रहे, लेकिन दसवीं कक्षा से अनेक सवाल उसके जेहन में उमड़ने लगे थे जिनका जवाब देने के लिए न पिता के पास फुर्सत थी, न माँ उसे समझ पा रही थीं। घर में कुल जमा वे तीन ही प्राणी थे... तमाम नाते-रिश्तेदारों से दूर। रौनक अकेलेपन और ऊब से बचने के लिए नशे का सहारा लेने लगा। सिगरेट से शुरू हुआ यह सफर ड्रग्स तक पहुँच गया और पिछले दिनों जब हीरेंद्र दौरे पर थे, तब उन्हें सूचना मिली कि सुबह जब काफी देर तक दरवाजा खटखटाने के बाद भी रौनक ने अपने कमरे का दरवाजा नहीं खोला तो परेशान हो उसकी माँ ने हीरेंद्र के फैमेली फ्रेंड वर्माजी के घर फोन किया। वर्माजी ऑफिस के लिए निकल ही रहे थे... सो तुरंत आ गए और जब 2-3 लोगों की मदद से दरवाजा तोड़ा गया तो अंदर ड्रग्स के ओवरडोज के कारण बेहोश पड़ा रौनक मिला। आनन-फानन वर्माजी उसे हॉस्पिटल ले गए और समय रहते इलाज मिलने से रौनक बच गया। हीरेंद्र के वापस आने पर वर्माजी ने शांति से बैठकर उन्हें स्थितियों पर विचार करने को कहा। वर्माजी पूरे समय न केवल हीरेंद्र तथा उनकी पत्नी को मानसिक संबल देते रहे बल्कि रौनक को भी उन्होंने अवसाद से बाहर निकाल लिया। आज हीरेंद्र और उनकी पत्नी, रौनक को पूरा समय दे पा रहे हैं और वर्मा परिवार तो उनके लिए सबसे खास हो गया है। कहा जाता है कि दुनिया में रिश्ते केवल रक्त सिंचित हों, यह कतई जरूरी नहीं। मन से बने रिश्ते इससे भी कहीं गहरे हो सकते हैं और ऐसा एक रिश्ता आपके लिए जिंदगीभर सबसे बड़ी ताकत बनकर रहता है। चाहे वे सगे-संबंधी हों, मित्र हों, सहयोगी हों, पड़ोसी हों या फिर मात्र परिचित हों। केवल खुशियों को बाँटते समय ही नहीं, कठिनाइयों में साथ निभाते समय भी ये रिश्ते आपका संबल बनकर उभरते हैं। अब नीता की ही कहानी को लीजिए।27 वर्षीय नीता एक फर्म में अकाउंटेंट है। यूँ उसकी सभी सहयोगियों से बोलचाल है, लेकिन जब जिक्र श्रीमती मेहता का होता है तो उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक आ जाती है। 54 वर्षीय श्रीमती मेहता इस कंपनी के पुराने कर्मचारियों में से हैं। जब नीता यहाँ नई आई थी तो उसने भी श्रीमती मेहता के साथ मित्रता करने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई।इस रिश्ते की शुरुआत तब हुई, जब 4 साल पहले नौकरी ज्वॉइन करने के एक साल बाद प्रेगनेंसी के दौरान नीता के सामने मुश्किलें आनी शुरू हुईं। उसके बाकी सहयोगी न तो उसकी मनःस्थिति को समझ पाए, न ही उसके शारीरिक कष्टों को। वहीं अनजान शहर में माता-पिता तथा सभी रिश्तेदारों से दूर नीता के लिए यह अनुभव नया और ढेर सारे प्रश्नों से भरा था। उसे कुछ समझ नहीं आता था और उसके पति राकेश के पास इतना समय नहीं था कि वे पूरे वक्त नीता के साथ रह सकें। नीता चिड़चिड़ी होती जा रही थी। ऐसे में उसकी मदद के लिए आगे आईं श्रीमती मेहता। उन्होंने बिलकुल माँ की तरह नीता की केयर की और दोस्त की तरह उसके साथ रहीं। उनके अनुभवों ने नीता की कई चिंताएँ दूर कर दीं। डिलेवरी के बाद भी वे हॉस्पिटल और घर के बीच नीता के लिए सेतु की तरह काम करती रहीं। आज नीता की दो वर्षीय बेटी नुपुर उसकी कम, श्रीमती मेहता की लाड़ली ज्यादा है। वह उन्हें नानी ही कहती है। नीता खुद कहती है- 'मन से बने इस रिश्ते ने मुझे काफी कुछ दे दिया। श्रीमती मेहता से मैं कब काकी के संबोधन पर आ गई, मुझे पता ही नहीं चला। अब राकेश मुझे छेड़ने के लिए कहते हैं कि तुम्हारी फ्रेंड उम्र में तुमसे कुछ बड़ी नहीं है?' असल में रिश्तों का ये हेल्दी बॉण्ड आपके अंदर भावनाओं को जिंदा रखने का महत्वपूर्ण काम करता है। जरा सोचिए... तेजी से यांत्रिक और भौतिक होते जीवन में अगर भावनाओं की जगह ही न बचे तो क्या आप इंसान भी बने रह पाएँगे? फिर परिवार और समाज जैसी संस्थाओं का क्या होगा? और इससे तो पूरी दुनिया में अराजकता ही फैल जाएगी। जरा सोचिए बिना अपनों के आपकी जिंदगी के उल्लासभरे पल कितने बेरंगे होंगे और दुखभरे पलों को बिताना भी कितना कठिन हो जाएगा? इसलिए रिश्तों के बंधन जोड़िए। कुछ सामान्य टिप्स भी आप याद रख सकते हैं।ऑफिस में या कॉलोनी में एक ग्रुप बनाइए जो महीने में एक बार कहीं मिलकर पिकनिक या आउटिंग पर जाए। अपने परिचितों और रिश्तेदारों में जिससे भी आपका मानसिक स्तर मेल खाता हो और जहाँ आपको लगता है कि सकारात्मक रिश्ते बन सकते हैं, वहाँ मेलजोल बनाए रखें।दोस्तों और परिचितों के साथ समय बिताएँ और समय-समय पर उनके सुख-दुख में शरीक हों।यदि आप एकल परिवार वाले माता-पिता हैं तो अपने परिवार, नाते-रिश्तेदारों के बारे में अपने बच्चों को जरूर बताएँ।बच्चों को अच्छे दोस्तों की कीमत समझाएँ और इस बारे में उन्हें पर्याप्त मार्गदर्शन दें। कोशिश करें कि वे सामाजिक आयोजनों में भी हिस्सा लें।अपने घर और बच्चों को समय दें और कम से कम हफ्ते में एक बार सबके साथ मिल-बैठकर, स्वस्थ मनोरंजन करने का कार्यक्रम जरूर बनाएँ। हमेशा याद रखिए यदि मुसीबत में कोई आपके काम आता है तो वह आपका सच्चा हितचिंतक है। ऐसे व्यक्ति से हेल्दी बॉण्ड तो डेवलप कीजिए ही, यथाक्षमता समय पड़ने पर उसकी मदद से भी चूकिए नहीं।आपकी जिंदगी में कोई व्यक्ति ऐसा जरूर हो जो विपरीत समय पर आपको सही मार्गदर्शन दे सके और उलझन सुलझाने में आपकी मदद कर सके।

No comments: