Thursday, November 26, 2009

यौन शोषण की शिकायतों को दबाने व सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों की धज्जियाँ

यौन शोषण की शिकायतों को दबाने व सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाने में माहिर पिटकुल अधिकारियों द्वारा अपनाये गये हथकण्डों का खुलासा करने में सूचना का अधिकार एक धारदार हथियार साबित हुआ।
सूचना का अधिकार के तहत, २६ मई २००९ को पिटकुल में प्राप्त यौन शोषण सम्बन्धी शिकायतों पर कृत कार्यवाही का ब्यौरा व जाँच समिति के सदस्यों के नाम व पदनाम मांगे जाने से अधिकारियों में हड़कंप मच गय तथा परिणाम स्वरुप नयी कमेटी का गठन १२ जून २००९ को कर दिया गया जिसका अध्यक्ष उत्तराखण्ड राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा को बनाया गया है।
अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेज़ों ने पिटकुल अधिकारियों द्वारा प्रकरण को दबाने की कलई खोल दी।
इस प्रकरण में कई शर्मनाक पहलू उजागर हुए जो निम्न प्रकार हैं :-१) ९ जनवरी २००७ को एक महिला अवर अभियन्ता द्वारा एक पुरुष अवर अभियन्ता पर यौन शोषण का आरोप लगाया।२) शिकायत पर कार्यवाही करते हुए १२ जनवरी २००९ को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए जाँच एकल समिति (पुरुष) को सौंप दी जबकि जांच समिति में कम से कम तीन सदस्य तथा अध्यक्ष व आधे सद्स्य महिलाये होनी चाहिय थी(सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशाका बनाम रजास्थान राज्य)
३)जाँच आधिकरी उपमहाप्रबन्धक कमल कान्त ने जाँच शुरु की किन्तु पी.सी.ध्यनी की युनियन व फ़ोन पर मिली धमकी के चलते जाँच आधिकरी नेजाँच से इन्कार किया(पत्राँक १९८/ई टी सी आर/इन्क्वायरी दि. १६/०१/०७)
४) प्रबन्ध निदेशक ने पत्राँक १७८/प्र. नि./पिटकुल/ई-११ दिनाँकित २० जनवरी २००७ को पुनः सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए तीन सदस्यीय (तीनों पुरुष) समिति का गठन किया गया।
५) इस समिति का अध्यक्ष जे. पी. तोमर लगभग डेढ वर्ष पूर्व सेवा निवृत्त हो चुका है।
६) २६ मई २००९ तक सूचना के अधिकार के तहत सूचना माँगे जाने तक मामला लगभग २ वर्ष ६ माह तक लम्बित रहा ।
७) १२ मई २००९ को नई जांच समिति का गठन किया गया जिसका अध्यक्ष राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा को बनाया गया है।
८) नई समिति के गठन तक दोनों पक्षों में कोई समझौता हुआ था। इस समिति के गठन के बाद एक जनसेवक द्वारा इस प्रकरण को नई समिति के सुपुर्द करने हेतु पिटकुल अधिकारियों को एक ज्ञापन दिया गया।
९) उक्त ज्ञापन से पिटकुल अधिकारियों में एक बार फ़िर हड़कंप मच गया और आनन फ़ानन मे पुरानी जाँच समिति के सदस्यों के समक्ष दोनों पक्षों मे. १३ जुलाई २००९ को समझौता दर्शाया गया है जो कानूनी रूप से अवैध है।
यहाँ गौरतलब है कि यौन शोषण की शिकायत को ९० दिनों के भीतर निस्तारित करने के बजाय लगभग ढाई वर्ष तक लम्बित रखा गया। इसके पीछे क्लर्क से वरिष्ठ प्रबन्धक बने कर्मचारी व अधिकारि युनियन के अध्यक्ष पी.सी.ध्यानी ही हैं क्योंकि आरोपित अधिकारी ध्यानी की युनियन का न केवल सक्रिय सदस्य है बल्कि ध्यानी का एक मोहरा है जो ध्यानी के लिए कुछ भी कर सकता है।
अब प्रश्न उठता है कि लगभग ढाई वर्षों तक न्याय की राह देखने वाली महिला अधिकारी ने अचानक समझौता कैसे कर लिया । विभाग से छ्न कर आने वाली खबरों को यदि सच माना जाये तो उक्त महिला अधिकारी ने एक लाख रुपये तथा पति के स्थानान्तरण के आश्वासन के बाद ही समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं ।
यदि इसमें ज़रा सी भी सच्चाई है तो निश्चित रुप से यह एक कलंक से कम नहीं क्योंकि कुछ महिलायें किसी पुरुष अधिकारी पर आरोप लगाकर अपना हित साध सकती हैं किन्तु इसक एक दूसरा पहलू भी है कि एक जूनियर अधिकारी अपने ही विभाग से उलझने की हिम्मत नहीं कर सकती और अधिकारियों के दबाव के चलते उसने इस समझौते पर हस्ताक्षर किये हों ।
चाहे जो भी पहलू हों किन्तु इस प्रकरण को पुनः जाँच कमेटी को सुपुर्द करके निष्पक्ष जाँच करायी जाए

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