देहरादून, 2012 के मिशन को पफतह करने के लिये दिल्ली की चकाचैंध् से उत्तराखण्ड पहुंचे भाजपा व कांग्रेस के मीडिया मैनेजर पांच सितारा होटलों में बैठकर अपने आकाओं को जीत-हार का गणित बताते हुए नजर आ रहे हैं। बंद कमरों में की जा रही इस चुनावी चाल में मीडिया मैनेजरों की बातें कितनी सटीक हैं इसका आंकलन तो 30 जनवरी को उत्तराखण्ड में होने वाले मतदान के बाद ही जनता का जनादेश मिलने के बाद ही पता चल पाएगा लेकिन इन पांच सितारा होटलों में बैठकर जिस तरह से मीडिया मैनेजर पार्टियों के पैसों को भारी मात्रा में खर्च कर रहे हैं उस पर चुनाव आयोग की नजरें इनायत क्यों नहीं हो रही। उत्तराखण्ड में एक प्रत्याशी 11 लाख रूपये की ध्नराशि ही चुनावी खर्च में खर्च कर सकता है लेकिन चुनाव आयोग रोजाना होने वाली इन बैठकों पर ध्यान देता हुआ नजर नहीं आ रहा। रोजाना राजनैतिक दलों के मीडिया मैनेजर पार्टी पफंड से हजारों रूपये पानी की तरह बहा रहे हैं और यह सिलसिला पिछले एक सप्ताह से भी अध्कि समय होने के चलते लगातार जारी है। दिल्ली से कांग्रस के एक मीडिया मैनेजर इन दिनों राजधनी के एक बड़े होटल में बैठकर अपने आकाओं को जीत-हार का गणित जिस तरह से कुछ चाटुकार मीडिया लोगों के माध्यम से कराने में लगे हैं उनमें कितनी हकीकत है इसका आंकलन करना बेहद मुश्किल भरा काम है। चुनाव आयोग एक तरपफ प्रत्याशियों के हर कार्यक्रम व चुनावी खर्च की नजर मजबूती के साथ रख रहा है। लेकिन बंद कमरों में रोजाना होने वाली इन दावतों का जिक्र न तो राजनैतिक अपने चुनावी खर्च में करते हुए देखे जा रहे हैं और न ही चुनाव आयोग इन पर रोक लगाने की कार्रवाई करता हुआ नजर आ रहा है। रोजाना किये जा रहे इस हजारों रूपये के ध्न का हिसाब चुनाव आयोग किस राजनैतिक दल से लेगा इसको लेकर भी उंगलियां उठनी शुरू हो गई है। राजनैतिक गलियारों में चर्चा आम हो गई है कि एक तरपफ तो चुनाव आयोग राज्य में बाहर से आने वाले काले ध्न पर लगातार अपना शिकंजा कसता जा रहा है वहीं दूसरी तरपफ इस तरह की होने वाली दावतों पर कोई रोक नहीं लगाई जा रही। जिससे लोकतंत्रा में निष्पक्ष चुनाव सम्पन्न हो इसे लेकर शंसय के बादल मंडराते दिख रहे हैं। माना जा रहा है कि इस तरह के घटना क्रम पर यदि शीघ्र ही रोक नहीं लगाई गई तो इसके खतरनाक परिणाम भी सामने आ सकते हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राजपुर रोड, सुभाष रोड, त्यागी रोड, हरिद्वार रोड, चकराता रोड के साथ-साथ कई अन्य स्थानों पर भी रोजाना होटलों के बंद कमरों में दावतों का जोर लगातार जारी है लेकिन इन स्थानों की जानकारी निर्वाचन आयोग को लगती हुई नजर नहीं आ रही। इन होटलों में रूकने वाले लोगों की पहचान अगर की जाए तो कई राजनैतिक चेहरों के साथ-साथ कई बड़े लोग बेपर्दा हो सकते हैं।
Tuesday, January 17, 2012
पांच सितारा होटलों तक सिमटी भाजपा-कांग्रेस देहरादून, 2012 के
विधनसभा चुनाव में जनता के बीच जनादेश पाने के लिये जोर आजमाइश में लगी भाजपा व कांग्रेस दोनों ही राजनैतिक पार्टियां घोषणा पत्रों को पांच सितारा होटलो में जारी कर हजारों रूपये पफूंकती हुई नजर आ रही हैं। जबकि इन घोषणा पत्रों को पार्टी मुख्यालयों में भी जारी किया जा सकता था।
लेकिन इसके बजाय दोनों ही राजनैतिक दल अपने घोषणा पत्रा को पांच सितारा होटलों की चकाचैंध् के बीच जनता के बीच प्रस्तुत करने में अपनी वाहवाही करते हुए नजर आ रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है जब उत्तराखण्ड में दिल्ली के नेताओं का आगमन होने के बाद उनकी आवभगत पांच सितारा होटलों में की जाती है। दिल्ली में जहां राष्ट्रीय दल अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्रा को पार्टी मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम के दौरान जारी करते हैं वहीं उत्तराखण्ड में दोनों ही राजनैतिक दलों की घोषणा पत्रा को जारी करने में चकाचैध् पांच सितारा होटलों की पीछा छोड़ती हुई नजर नहीं आ रही। जनता के बीच कांग्रेस जहां विकास के साथ-साथ हर वर्ग को साथ में लेकर चलना चाहती है वहीं भाजपा अपने घोषणा पत्रा में मौजूदा सरकार का कामकाज जनता के बीच लेजाकर सहानुभूति वोट बटोरना चाहती है। लेकिन पिछले पांच सालों में जनता को विकास की कितनी किरणों ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा सरकार पहुंचाने में कामयाब हो पाई है इसका सवाल भी उत्तराखण्ड की जनता वर्तमान सरकार से पूछती हुई नजर आ रही हैं कई विधनसभा क्षेत्रों में मुख्यमंत्राी को बदले जाने का पफैसला भी भाजपा के लिये टेढ़ी मुसीबत बनता हुआ नजर आ रहा है और भाजपा प्रत्याशियों को भी जनता के बीच सरकार का विकास किये जाने की गुड गर्वनेंस पहुंचाने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। हालात कई विधनसभाओं के इस कदर हैं कि क्षेत्राीय जनता सरकार से नाखुश नजर आ रही है। ऐसे में भाजपा सरकार अपने किस विकास को लेकर जनता के बीच जाती हुई दिख रही है यह आम आदमी की समझ में नहीं आ पा रहा। कांग्रेस भाजपा सरकार के शासनकाल में हुए घोटालों के साथ-साथ 2012 में सत्ता वापसी के बाद जनता को कईं संकल्प दोहराती हुई नजर आ रही है और कर्मचारियों के साथ-साथ युवाओं को रोजगार देने के अलावा कई मुद्दे प्रभावी तरीके से घोषणा पत्रा में प्रदर्शित किये गये हैं। भाजपा को सबसे ज्यादा मुश्किल सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्राी के रूप में सीएम प्रोजेक्ट करने को लेकर आ रही है और राजनाथ सिंह द्वारा बीते दिवस वर्तमान सीएम बीसी खण्डूरी को 2012 में पुनः सीएम प्रोजेक्ट करने की बात कहने से ही भाजपा के भीतर अंदरखाने विरोध् की आग सुलगनी शुरू हो गई है। जबकि कांग्रेस अभी 2012 में किसी को भी सीएम के रूप में प्रोजेक्ट नहीं कर रही है और कांग्रेस के सभी लोग एकजुटता के साथ 2012 काविधनसभा चुनाव जीतने में लगे हुए हैं। जनता को घोषणा पत्रा के माध्यम से विकास के सब्जबाग दिखाने वाली दोनों ही राजनैतिक पार्टियां पांच सितारा होटलों में बैठकर विकास का जो खाका तैयार कर रही हैं वह ध्रातल पर कितना उतर पाएगा इसे लेकर भी संशय के बादल मंडराते हुए नजर आ रहे हैं। इसके अलावा राजधनी के कई बड़े होटलों में मीडिया के साथ-साथ 2012 की रणनीति को लेकर भाजपा व कांग्रेस के साथ-साथ अन्य दलों के लोग भी राजनैतिक गोटियां पिफट करने में तेजी दिखाते हुए नजर आ रहे हैं और बड़े होटलों में पार्टी पफंड के माध्यम से रोजाना हजारों रूपये खर्च किये जा रहे हैं।
विधनसभा चुनाव में जनता के बीच जनादेश पाने के लिये जोर आजमाइश में लगी भाजपा व कांग्रेस दोनों ही राजनैतिक पार्टियां घोषणा पत्रों को पांच सितारा होटलो में जारी कर हजारों रूपये पफूंकती हुई नजर आ रही हैं। जबकि इन घोषणा पत्रों को पार्टी मुख्यालयों में भी जारी किया जा सकता था।
लेकिन इसके बजाय दोनों ही राजनैतिक दल अपने घोषणा पत्रा को पांच सितारा होटलों की चकाचैंध् के बीच जनता के बीच प्रस्तुत करने में अपनी वाहवाही करते हुए नजर आ रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है जब उत्तराखण्ड में दिल्ली के नेताओं का आगमन होने के बाद उनकी आवभगत पांच सितारा होटलों में की जाती है। दिल्ली में जहां राष्ट्रीय दल अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्रा को पार्टी मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम के दौरान जारी करते हैं वहीं उत्तराखण्ड में दोनों ही राजनैतिक दलों की घोषणा पत्रा को जारी करने में चकाचैध् पांच सितारा होटलों की पीछा छोड़ती हुई नजर नहीं आ रही। जनता के बीच कांग्रेस जहां विकास के साथ-साथ हर वर्ग को साथ में लेकर चलना चाहती है वहीं भाजपा अपने घोषणा पत्रा में मौजूदा सरकार का कामकाज जनता के बीच लेजाकर सहानुभूति वोट बटोरना चाहती है। लेकिन पिछले पांच सालों में जनता को विकास की कितनी किरणों ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा सरकार पहुंचाने में कामयाब हो पाई है इसका सवाल भी उत्तराखण्ड की जनता वर्तमान सरकार से पूछती हुई नजर आ रही हैं कई विधनसभा क्षेत्रों में मुख्यमंत्राी को बदले जाने का पफैसला भी भाजपा के लिये टेढ़ी मुसीबत बनता हुआ नजर आ रहा है और भाजपा प्रत्याशियों को भी जनता के बीच सरकार का विकास किये जाने की गुड गर्वनेंस पहुंचाने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। हालात कई विधनसभाओं के इस कदर हैं कि क्षेत्राीय जनता सरकार से नाखुश नजर आ रही है। ऐसे में भाजपा सरकार अपने किस विकास को लेकर जनता के बीच जाती हुई दिख रही है यह आम आदमी की समझ में नहीं आ पा रहा। कांग्रेस भाजपा सरकार के शासनकाल में हुए घोटालों के साथ-साथ 2012 में सत्ता वापसी के बाद जनता को कईं संकल्प दोहराती हुई नजर आ रही है और कर्मचारियों के साथ-साथ युवाओं को रोजगार देने के अलावा कई मुद्दे प्रभावी तरीके से घोषणा पत्रा में प्रदर्शित किये गये हैं। भाजपा को सबसे ज्यादा मुश्किल सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्राी के रूप में सीएम प्रोजेक्ट करने को लेकर आ रही है और राजनाथ सिंह द्वारा बीते दिवस वर्तमान सीएम बीसी खण्डूरी को 2012 में पुनः सीएम प्रोजेक्ट करने की बात कहने से ही भाजपा के भीतर अंदरखाने विरोध् की आग सुलगनी शुरू हो गई है। जबकि कांग्रेस अभी 2012 में किसी को भी सीएम के रूप में प्रोजेक्ट नहीं कर रही है और कांग्रेस के सभी लोग एकजुटता के साथ 2012 काविधनसभा चुनाव जीतने में लगे हुए हैं। जनता को घोषणा पत्रा के माध्यम से विकास के सब्जबाग दिखाने वाली दोनों ही राजनैतिक पार्टियां पांच सितारा होटलों में बैठकर विकास का जो खाका तैयार कर रही हैं वह ध्रातल पर कितना उतर पाएगा इसे लेकर भी संशय के बादल मंडराते हुए नजर आ रहे हैं। इसके अलावा राजधनी के कई बड़े होटलों में मीडिया के साथ-साथ 2012 की रणनीति को लेकर भाजपा व कांग्रेस के साथ-साथ अन्य दलों के लोग भी राजनैतिक गोटियां पिफट करने में तेजी दिखाते हुए नजर आ रहे हैं और बड़े होटलों में पार्टी पफंड के माध्यम से रोजाना हजारों रूपये खर्च किये जा रहे हैं।
Thursday, January 5, 2012
सभी पार्टियों में बगावती तेवर दिखा रहे हैं नेता
देहरादून राजनीति में पार्टी के प्रति निष्ठा कोई मायने नहीं रखती, थोड़ी सी उपेक्षा क्या हुई, बड़े से बड़े नेता भी बगावत का झंडा थाम लेते हैं। कुछ यही हाल आजकल उत्तराखंड की राजनीति में भी आया हुआ है। वह चाहे कांग्रेसी दिग्गज नारायण दत्त तिवारी हों या फिर टिकट कटने से आहत भाजपाई, जगह-जगह बगावत के झंडे दिखाई दे रहे हैं। कोई समर्थकों के दबाव की बात कह रहा है तो कुछ ने पार्टी से इस्तीफा ही दे दिया है।
सभी पार्टियों में बगावती तेवर दिखा रहे हैं नेता
शुरुआत टिकट से वंचित रह गए भाजपा नेताओं से। जिन नेताओं को टिकट नहीं मिला है, वो बगावत की राह में निकल चुके हैं। कुछ दावेदार चुपचाप दोबारा से सेटिंग करने में जुट गए हैं, लेकिन कुछ ने पार्टी के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया है। कैबिनेट मंत्री खजानदास को उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें राजपुर रोड से चुनावी मैदान में उतारेगी लेकिन उनका तो पत्ता ही साफ हो गया। अब वह इससे काफी आहत हैं और खुलकर बोल भी रहे हैं। उन्होंने इसे साजिस कहा है। वह इस मामले में मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी, पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी, प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल से मिलकर अपना विरोध दर्ज कराएंगे। इसी मुद्दे पर उनके समर्थकों ने प्रदेश मुख्यालय पर हंगामा भी किया।
इसी तरह कर्णप्रयाग के विधायक अनिल नौटियाल, सहसपुर विधायक राजकुमार, कोटद्वार विधायक शैलेंद्र सिंह रावत के समर्थकों ने खुलेआम पार्टी के निर्णय के विरोध में प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है। इन सभी ने भी बगावती तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। दिवाकर भट्ट को पार्टी सिंबल से लड़ाने का विरोध हो रहा है। उधर अल्मोड़ा में जिलाध्यक्ष समेत 216 पदाधिकारियों ने अपना सामूहिक इस्तीफा पार्टी को भेज दिया है। बागेश्वर व कपकोट में भी विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। जिन सीटों पर प्रत्याशी घोषित नहीं हुए हैं, वहां भी दावेदार आशंकित हैं और सभी परिस्थितियों की तैयारी कर रहे हैं।
दूसरी तरफ कांग्रेस में सूची जारी होने से पहले ही मुश्किल खड़ी हो गई है। तिवारी समर्थकों ने निरंतर विकास समिति के बैनर तले पूरे प्रदेश में सभी 70 सीटों में चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। अब कांग्रेस एनडी तिवारी को समझाने-बुझाने में जुट गई है। प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद कांग्रेस में भी कई बगावती नेता दिखाई दे सकते हैं।
Thursday, August 4, 2011
उत्तराखण्ड में 2012 चुनाव समय पर होंगे।
पेड न्यूज, फर्जी वोटिंग, फंड मिसयूज पर लगेगी रोक।
देहरादून। । उत्तराखण्ड में विधान सभा चुनाव की तैयारियां को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रदेश के आला अधिकारियों की बैठक के साथ जो संकेत दिए हैं उससे चुनाव समय पर होने की बाते सामने आ रही हैं। सात राजनैतिक दलो के साथ विचार करने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को कई समस्याओ से भी रूबरू कराया गया है। जिनमें उत्तराखण्ड में फर्जी वोटिंग, पोलिंग स्टेशनो की दूरी, पेड न्यूज, पब्लिक फंड का मिस्यूज, मिसिंग वोटरो को ढूंढना, कैश के बदले वोट सिस्टम सहित कई अन्य बातो के सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग अब इन सब पर पैनी नजर रख रहा है। उत्तराखण्ड में विधान सभा चुनाव को लेकर जिस तरह से डुगडुगी बजनी शुरू हो गई है उससे साफ संकेत जा रहे हैं कि विधान सभा 2012 के चुनाव अपने नियत समय में दिसम्बर जनवरी में होने तय हैं क्योकि एनसीपी व सीपीएम के अलावा किसी भी अन्य राजनैतिक पार्टी ने उत्तराखण्ड में विधान सभा चुनाव नवम्बर में कराए जाने की बात मुख्य चुनाव आयुक्त को नही कही है जिससे साफ संकेत हो गए है कि कांग्रेस, भाजपा, बसपा, उक्रांद के साथ साथ कोई भी राजनैतिक पार्टी समय से पहले चुनाव नही कराना चाहती। जबकि चुनाव आयोग अपनी पूरी तैयारी के साथ विधान सभा चुनाव की कमान संभालने को तैयार बैठा है। उत्तरप्रदेश व उत्तराखण्ड का दौरा करने के बाद मणीपुर, पंजाब, गोवा दौरे के बाद ही विधान सभा चुनाव की होने वाली तिथि का पता चल पाएगा क्योकि मुख्य चुनाव आयुक्त अभी 3 राज्यो का दौरा करने के बाद अपनी रिपोर्ट केन्द्र को सौंपेंगे जिसके बाद ही देश के 5 राज्यो में 2012 में हाने वाले विधान सभा चुनाव की तिथि तय हो पाएगी। वैसे माना जा रहा है कि उत्तरप्रदेश के साथ साथ उत्तरारखण्ड में एक साथ चुनाव सम्पन्न कराए जा सकते हैं और दोनो ही राज्यो में चुनाव आयोग अपनी तैयारी के साथ मतदाताओ के वोटर कार्ड बनाने की अंतिम प्रक्रिया पूरी कर रहा ळै। मुख्य निर्वाचन आयुक्त का साफ मत है कि उत्तराखण्ड में लिफाफो में पैसा वोटरो को बाटा जाता है और पेड न्यूज की उत्तराखण्ड में बहुत बड़ी समस्या सामने है जिसे दूर करने के लिए कोई कसर नही छोड़ी जाएगी। उनके अनुसार बिहार में पेड न्यूज पर रोक लगाने के लिए जिस तरह की कमेटी बनाई थी उसे उत्तराखण्ड में भी लागू किया जाएगा। इसके अलावा मिसिंग वोटर जो यूथ की श्रेणी मे हैं उन्हे ढूंढकर मतदान स्थल तक पहुचाने के लिए जागरूकता अभियान भी शुरू किए जायेंगे। इसके अलावा पब्लिक फंड का मिस्यूज होने की शिकायते ंभी जिस तरह से सामने आ रही है उस पर भी लगाम लगाई जायेगी। एमपी व एमएलए चुने जाने के कई सालो बाद तक भी अपनी फंड को खर्च नही करते और चुनावी वर्ष के दौरान फंड को खर्च किया जाता है जो जनता के हित में ठीक नही। उनके अनुसार कई पोलिंग स्टेशन पर्वतीय क्षेत्रों के कारण दूर स्थान पर मौजूद हैं जिन्हे पास किया जाएगा। उन्होने कहा कैश के बदले वोट सिस्टम को उत्तराखण्ड मे लागू नही होने दिया जाएगा और मतदाताओ की कम संख्या भी इसी कारण बढ़ रही है कि राजनेता कैश के बदले वोट सिस्टम को लागू कर रहे हैं जो स्वस्थ चुनाव सम्पन्न कराने के लिए ठीक नहीं। उत्तराखण्ड मे होने वाले विधान सभा चुनाव को लेकर निर्वाचन आयोग कड़े तेवर में आ गया है और माना जा रहा है कि मार्च में बोर्ड की परीक्षाएं होने के कारण पहले चुनाव को इसी माह कराने का निर्णय था लेकिन अब इस पर एक राय नही बन पायी है और अब उत्तराखण्ड में 2012 का चुनाव अपने नियत समय में होगा। 2007 में जिस तरह दिसम्बर माह में आचार संहिता लगी थी ठीक उसी तरह 2012 के इलैक्शन में भी वही रोस्टर प्रणाली को लागू किया जाएगा। इसके अलावा अगस्त माह तक टाªंसफर पाॅलीसी के तहत 3 साल से ज्यादा एक ही जनपद में रहने वाले अधिकारियो को इधर से उधर किया जाएगा। वही निर्वाचन आयोग बीएलओ को ज्यादा मजबूत करने पर भी ध्यान दे रहा है उसके अनुसार बीएलओ मतदान स्थल पर वही का होना चाहिए जिससे मतदाताओ को पहचानने में परेशानी ना हो कुल मिलाकर निर्वाचन आयोग उत्तराखण्ड में चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार हो गया है लेकिन यह भी साफ संकेत हो गए है कि उत्तराखण्ड में समय पर चुनाव सम्पन्न होगे लेकिन निर्वाचन आयोग के अनुसार वह किसी भी राज्य में 6 महीने पहले चुनाव सम्पन्न करा सकता है इसके लिए उसे राज्य सरकार की अनुमति की कोई आवश्यकता नही होती।
देहरादून। । उत्तराखण्ड में विधान सभा चुनाव की तैयारियां को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रदेश के आला अधिकारियों की बैठक के साथ जो संकेत दिए हैं उससे चुनाव समय पर होने की बाते सामने आ रही हैं। सात राजनैतिक दलो के साथ विचार करने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को कई समस्याओ से भी रूबरू कराया गया है। जिनमें उत्तराखण्ड में फर्जी वोटिंग, पोलिंग स्टेशनो की दूरी, पेड न्यूज, पब्लिक फंड का मिस्यूज, मिसिंग वोटरो को ढूंढना, कैश के बदले वोट सिस्टम सहित कई अन्य बातो के सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग अब इन सब पर पैनी नजर रख रहा है। उत्तराखण्ड में विधान सभा चुनाव को लेकर जिस तरह से डुगडुगी बजनी शुरू हो गई है उससे साफ संकेत जा रहे हैं कि विधान सभा 2012 के चुनाव अपने नियत समय में दिसम्बर जनवरी में होने तय हैं क्योकि एनसीपी व सीपीएम के अलावा किसी भी अन्य राजनैतिक पार्टी ने उत्तराखण्ड में विधान सभा चुनाव नवम्बर में कराए जाने की बात मुख्य चुनाव आयुक्त को नही कही है जिससे साफ संकेत हो गए है कि कांग्रेस, भाजपा, बसपा, उक्रांद के साथ साथ कोई भी राजनैतिक पार्टी समय से पहले चुनाव नही कराना चाहती। जबकि चुनाव आयोग अपनी पूरी तैयारी के साथ विधान सभा चुनाव की कमान संभालने को तैयार बैठा है। उत्तरप्रदेश व उत्तराखण्ड का दौरा करने के बाद मणीपुर, पंजाब, गोवा दौरे के बाद ही विधान सभा चुनाव की होने वाली तिथि का पता चल पाएगा क्योकि मुख्य चुनाव आयुक्त अभी 3 राज्यो का दौरा करने के बाद अपनी रिपोर्ट केन्द्र को सौंपेंगे जिसके बाद ही देश के 5 राज्यो में 2012 में हाने वाले विधान सभा चुनाव की तिथि तय हो पाएगी। वैसे माना जा रहा है कि उत्तरप्रदेश के साथ साथ उत्तरारखण्ड में एक साथ चुनाव सम्पन्न कराए जा सकते हैं और दोनो ही राज्यो में चुनाव आयोग अपनी तैयारी के साथ मतदाताओ के वोटर कार्ड बनाने की अंतिम प्रक्रिया पूरी कर रहा ळै। मुख्य निर्वाचन आयुक्त का साफ मत है कि उत्तराखण्ड में लिफाफो में पैसा वोटरो को बाटा जाता है और पेड न्यूज की उत्तराखण्ड में बहुत बड़ी समस्या सामने है जिसे दूर करने के लिए कोई कसर नही छोड़ी जाएगी। उनके अनुसार बिहार में पेड न्यूज पर रोक लगाने के लिए जिस तरह की कमेटी बनाई थी उसे उत्तराखण्ड में भी लागू किया जाएगा। इसके अलावा मिसिंग वोटर जो यूथ की श्रेणी मे हैं उन्हे ढूंढकर मतदान स्थल तक पहुचाने के लिए जागरूकता अभियान भी शुरू किए जायेंगे। इसके अलावा पब्लिक फंड का मिस्यूज होने की शिकायते ंभी जिस तरह से सामने आ रही है उस पर भी लगाम लगाई जायेगी। एमपी व एमएलए चुने जाने के कई सालो बाद तक भी अपनी फंड को खर्च नही करते और चुनावी वर्ष के दौरान फंड को खर्च किया जाता है जो जनता के हित में ठीक नही। उनके अनुसार कई पोलिंग स्टेशन पर्वतीय क्षेत्रों के कारण दूर स्थान पर मौजूद हैं जिन्हे पास किया जाएगा। उन्होने कहा कैश के बदले वोट सिस्टम को उत्तराखण्ड मे लागू नही होने दिया जाएगा और मतदाताओ की कम संख्या भी इसी कारण बढ़ रही है कि राजनेता कैश के बदले वोट सिस्टम को लागू कर रहे हैं जो स्वस्थ चुनाव सम्पन्न कराने के लिए ठीक नहीं। उत्तराखण्ड मे होने वाले विधान सभा चुनाव को लेकर निर्वाचन आयोग कड़े तेवर में आ गया है और माना जा रहा है कि मार्च में बोर्ड की परीक्षाएं होने के कारण पहले चुनाव को इसी माह कराने का निर्णय था लेकिन अब इस पर एक राय नही बन पायी है और अब उत्तराखण्ड में 2012 का चुनाव अपने नियत समय में होगा। 2007 में जिस तरह दिसम्बर माह में आचार संहिता लगी थी ठीक उसी तरह 2012 के इलैक्शन में भी वही रोस्टर प्रणाली को लागू किया जाएगा। इसके अलावा अगस्त माह तक टाªंसफर पाॅलीसी के तहत 3 साल से ज्यादा एक ही जनपद में रहने वाले अधिकारियो को इधर से उधर किया जाएगा। वही निर्वाचन आयोग बीएलओ को ज्यादा मजबूत करने पर भी ध्यान दे रहा है उसके अनुसार बीएलओ मतदान स्थल पर वही का होना चाहिए जिससे मतदाताओ को पहचानने में परेशानी ना हो कुल मिलाकर निर्वाचन आयोग उत्तराखण्ड में चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार हो गया है लेकिन यह भी साफ संकेत हो गए है कि उत्तराखण्ड में समय पर चुनाव सम्पन्न होगे लेकिन निर्वाचन आयोग के अनुसार वह किसी भी राज्य में 6 महीने पहले चुनाव सम्पन्न करा सकता है इसके लिए उसे राज्य सरकार की अनुमति की कोई आवश्यकता नही होती।
राज्य सरकार चिकित्सकों की सुरक्षा के लिए संवेदनशील है। निशंक
देहरादून, 03 अगस्त, 2011मुख्यमंत्री डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक से बुधवार को सचिवालय में प्रांतीय चिकित्सक संघ के पदाधिकारियों ने भेंट कर राज्य सरकार द्वारा सिक्योरिटी एक्ट बनाने के प्रस्ताव को कैबिनेट में मंजूरी मिलने पर धन्यवाद दिया।इस अवसर पर मुख्यमंत्री डाॅ. निशंक ने कहा कि राज्य सरकार चिकित्सकों की सुरक्षा के लिए संवेदनशील है। उन्होंने कहा कि सिक्योरिटी एक्ट को लागू कर सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है। मुख्यमंत्री डाॅ. निशंक ने कहा कि सरकार डाक्टरों एवं चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा हेतु संकल्पबद्ध है। आम आदमी को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिले, इसके लिए चिकित्सक भी अपने कर्तव्यों का पालन सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि सरकार ने आम आदमी को बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न योजनाएं शुरू की है, जिनका लाभ उन्हें मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि चिकित्सालयों में आधुनिक उपकरण स्थापित किये किये है। साथ ही सचल चिकित्सालय भी संचालित किये जा रहे है।मुख्यमंत्री से भेंट करने वालों में प्रांतीय चिकित्सक संघ के अध्यक्ष डाॅ. एस.डी.जोशी, महासचिव डी.पी.जोशी, सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे।
Thursday, May 5, 2011
भारत को भी उत्तराखण्ड में नये रेलवे परिपथ बनाने चाहिएः डाॅ0 निषंक
नयी दिल्ली 5 मई, 2011 उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री डाॅ0 रमेष पोखरियाल निषंक ने यहां योजना आयोग के उपाध्यक्ष डाॅ0 मोन्टेक सिंह आहलूवालिया की अध्यक्षता में योजना भवन में आयोजित 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंतिम वर्ष में अपने राज्य हेतु 666 करोड़ रुपए की अतिरिक्त सहायता समेत 7800 करोड़ रुपए की 2011-12 की वार्षिक योजना को अनुमोदित कराने में सफलता प्राप्त की। यह विगत वर्ष की योजना से 1000 करोड़ रुपए अधिक है।
इस अवसर पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष डाॅ0 मोेन्टेक सिंह आहलूवालिया ने उत्तराखण्ड द्वारा हाल के वर्षों में निरन्तर बेहतर प्रगति और विकास की गति बनाये रखने की सराहना करते हुए यकीन दिलाया कि केन्द्र के स्तर पर राज्य में बेहतर रेल तथा हवाई सेवाओं की सुविधाओं के विस्तार की मांग को मंजूर कराने में वह पूरी मदद देंगे। उन्होंने सलाह दी कि राज्य इन सेवाओं के लिए अपना प्रस्ताव षीघ्रता से उपलब्ध कराये। डाॅ0 आहलूवालिया ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में पूरे राष्ट्र में उत्तराखण्ड के बेहतर कार्य की भी सराहना की।
इससे पहले उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री डाॅ0 निषंक ने देष के हिमालयी राज्यों की विषम भौगोलिक परिस्थितियों और समस्याओं का विस्तार से उल्लेख करते हुए पुराने हिमालयी राज्यों तथा उत्तर-पूर्व के अषान्त राज्यों के मुकाबले उत्तराखण्ड की आवष्यकताओं को भारत सरकार द्वारा नजरअंदाज करने का उल्लेख करते हुए कहा कि पड़ोसी देश चीन द्वारा भारतीय सीमा तक रेलवे का विकास किया जा रहा है। वर्तमान में बीजिंग से ल्हासा तक रेल मार्ग सृजित हो चुका है तथा उत्तराखण्ड की सीमा के सन्निकट तकलाकोट तक इसका विस्तार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि संघर्ष या युद्ध की स्थिति में सीमा तक सेना एवं सैन्य सामग्री की पहुंच शीघ्रतापूर्वक सुनिष्चित हो सके, इस हेतु भारत सरकार को ऋषिकेष-कर्णप्रयाग, टनकपुर- बागेष्वर, बागेष्वर-कर्णप्रयाग रेलवे परिपथ के निर्माण कार्य शीघ्र किये जाने की आवश्यकता है। डाॅ0 निषंक ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य के विकास एवं राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से शिमला-त्यूणी-लोहाघाट हिमालयन हाइवे (भ्पउंसंलंद भ्पहीूंल) का निर्माण कराया जाना आवश्यक है। इस प्रकार की संस्तुति हिमालयी राज्यों एवं क्षेत्रों की समस्याओं पर योजना आयोग, भारत सरकार द्वारा गठित टास्क फोर्स ने भी अपनी रिपोर्ट में दी है। इसे शीघ्रता से कार्यरूप दिया जाये।
उत्तराखण्ड की चीन एवं नेपाल से क्रमशः 350 किमी0 एवं 275 किमी0 लम्बी अन्तर्राष्ट्रीय सीमायें खुली होने का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों के समेकित विकास के लिये बार्डर एरिया डेवलपमैन्ट प्लान के अन्तर्गत राज्य के सभी 26 सीमान्त विकासखण्डों के विकास हेतु तथा उन्हें सड़क, विद्युत, दूरसंचार सुविधाओं से जिला मुख्यालय से जोड़ने हेतु यह योजना लागू करने की मांग की।
इस मौके पर डाॅ0 निषंक ने अनुरोध किया कि उत्तराखण्ड में सभी केन्द्र पोषित योजनाओं का वित्त पोषण पूर्वोत्तर सीमान्त के राज्यों की भांति ही 90ः10 के अनुपात में किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उग्र और अषान्त क्षेत्रों को शान्त क्षेत्रों के मुकाबले अधिक महत्व दिये जाने के दोहरे मापदण्ड से गलत संकेत जाते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखण्ड को 2001-02 में विषेष श्रेणी राज्य का दर्जा दिया गया था, परन्तु वित्त पोषण के मामले में इस राज्य की भारी उपेक्षा की जाती है, जिसके परिमार्जन के लिए 2001-02 से 2010-11 तक की अवधि की अवषेष धनराषि 2400 करोड़ रुपए एकमुष्त विषेष पैकेज के रुप में स्वीकृत की जाय।
उन्हांेने कहा कि उत्तराखण्ड भी पूर्वोत्तर राज्यों की भांति विशेष श्रेणी का राज्य है। अतः राज्य में नैनी-सैनी (पिथौरागढ़) चिन्यालीसौड़ (उत्तरकाशी) तथा गौचर (चमोली), हवाई-अड्डों का विकास भी इसी फार्मूले पर शत-प्रतिशत अवस्थापना अनुदान के माध्यम से भारत सरकार के वित्त पोषण से किया जाना आवश्यक है, क्योंकि ये तीनों स्थल संवेदनशील अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर भी स्थित हैं, तथा इनका सामरिक महत्व भी है। डाॅ0 निषंक ने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची में रेलवे केन्द्रीय सूची का विषय है, इसके बावजूद उत्तराखण्ड सरकार पर रेलवे परियोजनाओं के लागत में 50 प्रतिषत की हिस्सेदारी वहन करने पर जोर डाला जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित मुजफ्फरनगर-रूड़की रेलमार्ग की निर्माण लागत भी शत्-प्रतिषत केन्द्र सरकार द्वारा वहन की जाये।
डाॅ0 निषंक ने बताया कि वर्ष 2010-11 में हुई रिकार्ड अतिवृष्टि के कारण विगत 10 वर्षो में राज्य ने जो परिसंपत्तियां एवं अवस्थापना सुविधायें सृजित की थीं वह बड़ी संख्या में ध्वस्त हो गई हैं। इसके साथ ही भारी भू-स्खलन के कारण 200 से अधिक गांव विनाश के कगार पर आ गये हैं, जिन्हें समय रहते अन्यत्र बसाया जाना आवश्यक है। इन्हें पुनस्र्थापित करने में लगभग 21000 करोड रूपये का व्यय अनुमानित है। इस प्राकृतिक विभीषिका को दृष्टिगत रखते हुए क्षतिग्रस्त योजनाओं की शीघ्र पुनस्र्थापना हेतु विशेष सहायता पैकेज दिया जाय।
मुख्यमंत्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि उत्तराखण्ड को विशेष केन्द्रीय सहायता ;ैब्।द्ध के रूप में 60 करोड़ रुपए तथा विशेष आयोजनागत सहायता ;ैच्।द्ध में 300 करोड़ रुपए ही आबंटित हुए। उन्होंने इस मामले में भी अपने राज्य को हिमाचल की भांति ही विशेष केन्द्रीय सहायता एवं विशेष आयोजनागत सहायता स्वीकृत करने की मांग की। उन्हांेने आगे कहा कि उत्तराखण्ड में लगभग 65 प्रतिशत भू-भाग वनाच्छादित है तथा मात्र 13 प्रतिशत भूमि कृषि के अन्तर्गत है। वन क्षेत्र की अधिकता के कारण विभिन्न विकास गतिविधियों को संचालित करने में अनेक बाधायें उत्पन्न होती हैं। उत्तराखण्डवासियों का वनों के विकास में जन सहभागिता करते हुए राज्य में 12089 वन पंचायतें गठित की है तथा राज्य गठन के उपरान्त वनाच्छादित क्षेत्रफल में 1141 वर्ग कि0मी0 क्षेत्रफल की वृद्धि हुई है। हाल में सम्पन्न बाघ गणना में राज्य में बाघों की संख्या में भी वृद्धि हुई है, जबकि अन्य प्रदेशों में स्थिति भिन्न है फिर भी वन्य जीव संरक्षण हेतु उत्तराखण्ड को केन्द्र से संरक्षण, संवर्द्धन तथा सहायता के साथ ही जो विषेष दर्जा दिया जाना चाहिए वह अभी तक अप्राप्त है।
मुख्यमंत्री डाॅ0 निषंक ने जोर देकर कहा कि योजना आयोग, भारत सरकार द्वारा तैयार की गयी पर्यावरण रिपोर्ट में उत्तराखण्ड को पर्यावरणीय सेवाओं के संरक्षण के लिए देश के सभी राज्यों में प्रथम स्थान पर रखा गया है जिससे इस राज्य द्वारा किये जा रहे प्रयासों की पुष्टि होती है। इसके विपरीत वन संरक्षण अधिनियम एवं पर्यावरण सरंक्षण से सम्बन्धित विभिन्न नियमों का बोझ केवल इसी राज्य की जनता पर अनावष्यक रुप से डाला जा रहा है जिससे विकास कार्य अवरूद्ध हो रहे है।
डाॅ0 निषंक ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य द्वारा दी जा रही प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से जीवनदायी पर्यावरणीय सेवाओं को वैज्ञानिक विधि से विभिन्न संस्थाओं द्वारा आंकलन किया गया है। इनके अनुसार राज्य द्वारा लगभग 35000 से 40000 करोड़ रुपए मूल्य की पारिस्थितिकीय सेवायें प्रतिवर्ष दी जानी आंकी गई है, जिनका लाभ देश ही नहीं अपितु विश्व को मिल रहा है। किन्तु इस पर्यावरण संरक्षण योगदान एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण सेवा के एवज में राज्य को किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति नहीं की जा रही है। साथ ही उत्तराखण्ड के नदी नालों से रेता-बजरी चुगान पर भी केन्द्र द्वारा प्रतिबन्ध लगाया गया जबकि इस प्रकार का चुगान नदी नालों को नियंत्रित करने में सहायक होता है। अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री डाॅ. निषंक ने प्राकृतिक वन सम्पदा के संरक्षण के लिए उत्तराखण्ड राज्य को प्रोत्साहन स्वरूप ग्रीन बोनस के रूप में प्रतिवर्ष 1000 करोड़ रूपये का विशेष पैकेज स्वीकृत करने की भी मांग की।
योजना आयोग के सम्मुख उत्तराखण्ड को प्रदत्त विशेष औद्योगिक पैकेज की अवधि 2013 से घटाकर मार्च 2010 में ही समाप्त करने का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इसके कारण राज्य में निवेषित धनराषि एवं लगभग दो लाख चैसठ हजार व्यक्तियों का रोजगार गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य में औद्योगिक तथा निवेष का वातावरण कायम रखने के लिए विषेष औद्योगिक सहायता पैकेज को पुनर्जीवित कर वर्ष 2020 तक बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लम्बी अवधि से विकसित राज्यों की शैशवस्था से गुजर रहे पिछड़ेपन के आधार पर गठित राज्य उत्तराखण्ड अर्थात समान से असमान की तुलना करना कदापि उचित नहीं है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सभी धर्मावलम्बियों के तीर्थों एवं धार्मिक स्थानों हेतु उत्तराखण्ड राज्य के प्रसिद्ध होने के कारण इस राज्य में असंख्य श्रद्धालुओं का आवागमन होता है और इनसे सम्बन्धित मूलभूत सुविधाओं, कानून व्यवस्था, सुरक्षा, पेयजल, स्वच्छता, चिकित्सा, यातायात, पार्किंग आदि व्यवस्थाओं हेतु योजना आयोग के स्तर उत्तराखण्ड को 500 करोड़ रुपए की सहायता दिये जाने पर विचार किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने केन्द्र सरकार द्वारा राज्य की अनेक निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक के कारण राज्य सरकार को हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति की मांग करते हुए ऐसे अवसरों की क्षतिपूर्ति के साथ ही 2000 मेगावाट विद्युत केन्द्रीय पूल से निःशुल्क उपलब्ध कराने की मांग भी की। उन्होंने उत्तराखण्ड के नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्रोतों के सूखने के कारण सदानीरा नदियों से पंम्पिंग योजनाओं के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराने के लिये निमार्णाधीन पम्पिंग योजनाओं को पूर्ण करने के लिए 500 करोड़ रुपए की विशेष केन्द्रीय सहायता पृथक से स्वीकृत किये जाने का अनुरोध किया।
मुख्यमंत्री डाॅ0 निशंक ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य के विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में अतिवृष्टि, भू-स्खलन से मोटर मार्गों का अवरूद्ध होना एवं सड़क दुर्घटनाओं से तत्काल निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा राज्य को दैवी आपदा राहत के लिए प्रतिवर्ष विशेष पैकेज के रूप में आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। उन्होने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य के पूर्व सैनिकों के कल्याण एवं उन्हें पुनः सेवायोजित करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा एक विशेष कार्ययोजना के तहत उत्तराखण्ड को एक अलग से पैकेज दिया जाना अपेक्षित है।मुख्यमंत्री डाॅ0 निषंक ने कहा कि वर्तमान में राज्य में प्राथमिक शिक्षा में नामांकन के सापेक्ष उच्च शिक्षा में नामांकन दर 10 प्रतिशत के लगभग है। मानक दर 33 प्रतिशत करने हेतु उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अवस्थापना सुविधाओं को सुदृढ़ किया जाना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु राज्य सरकार को केन्द्रीय सहायता की आवश्यकता है। उन्होने कहा कि राज्य की जटिल भोैगोलिक परिस्थितियों तथा वन विभाग से अनापत्ति लेने में होने वाले विलम्ब से बचने हेतु अनुरोध किया कि मुख्य वन संरक्षक, केन्द्रीय क्षेत्र को 10 हैक्टेयर की जगह 20 हैक्टेयर वन भूमि के स्थानान्तरण करने का अधिकार अनुमन्य किया जाये। मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम (मनरेगा) के प्रभावी एवं बेहतर प्रबन्धन के लिए इसके अन्तर्गत प्रषासनिक व्यय 6 प्रतिषत से बढ़ाकर 10 प्रतिषत किया जाना चाहिए। धनराषि अनेक किस्तों की बजाय दो किस्तों में जारी की जानी चाहिए। समाज के कमजोर वर्गों की माँग को ध्यान में रखते हुए 100 दिवसों के रोजगार की बजाय कम से कम 120 दिवसों का रोजगार दिया जाना चाहिए तथा परियोजना के अन्तर्गत सामग्री ;डंजमतपंसद्ध अंष को 40 प्रतिषत से बढ़ाकर 50 प्रतिषत किये जाने की आवष्यकता है। उन्होंने कहा कि त्वरित ऊर्जा विकास एवं सुधार परियोजना ;।च्क्त्च्द्ध के अन्तर्गत वर्तमान में 10 हजार से अधिक जनसंख्या के 31 नगर आच्छादित है। भारत सरकार से अनुरोध है कि राज्य की विरल जनसंख्या एवं छोटे कस्बों की बहुतायत को देखते हुए इस परियोजना के चयन हेतु जनसंख्या के मानक को 10 हजार से घटाकर 5 हजार किया जाय।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह वर्ष 11वीं पंचवर्षीय योजना का अन्तिम वर्ष है तथा आपके मार्गदर्शन में 12वीं पंचवर्षीय योजना का कार्य चल रहा है। अतः यह उचित अवसर होगा कि हमारे राज्य द्वारा अनुभूत समस्याओं का समुचित निराकरण किया जाय। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा बीपीएल परिवारों की लड़कियों की षिक्षा के लिए ‘‘गौरा देवी कन्या धन योजना’’ व गांवों के समग्र विकास के लिए प्रत्येक न्याय पंचायत में से एक ग्राम का चयन कर 670 ग्रामों में ‘‘अटल आदर्ष ग्राम योजना’’ प्रारम्भ की गई है। इसके अलावा राज्य के महत्वपूर्ण पर्यटक स्थलों को यातायात सुविधाओं से जोड़ने के विशेष प्रयास किये जा रहें हैं। इसके लिए सड़क निर्माण, रज्जु मार्गों का निर्माण, हैलीपैड्स की स्थापना तथा राज्य के हवाई-अड्डों के विस्तारीकरण पर जोर दिया जा रहा है ताकि उच्च आय-वर्ग के पर्यटक राज्य की ओर आकर्षित हो सकंे। उन्होंने कहा कि राज्य में 73वें संविधान संशोधन विधेयक के प्रावधानों के अनुरूप जनपद स्तरीय जिला नियोजन समितियों का गठन किया जा चुका है तथा चयनित प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर दी गई है।
डाॅ0 निषंक ने कहा कि वाह्य सहायतित परियोजनाओं, संसाधन आधारित केन्द्र पोषित योजनाओं, अन्य केन्द्रीय योजनाओं के राज्यांश की व्यवस्था, एवं जिला नियोजन समितियों द्वारा अनुमोदित योजनावार परिव्यय को सम्मिलित करते हुये राज्य संसाधन आधारित परिव्यय 6200 करोड़ रूपए के (प्रस्तावित) सापेक्ष लगभग 4136.45 करोड़ रूपए का परिव्यय वचनबद्ध मदों में प्रस्तावित है। अतः राज्य सेक्टर, जिसके अन्तर्गत क्षेत्रीय आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु अतिमहत्वपूर्ण अवस्थापना एवं सामाजिक क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करना होता है, उसके लिये थ्सवंजपदह परिव्यय अत्यधिक कम रह जाता है। अतः वार्षिक योजना पर अन्तिम अनुमोदन के समय इस बिन्दु पर विचार किया जाना चाहिए।
इस अवसर पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष डाॅ0 मोेन्टेक सिंह आहलूवालिया ने उत्तराखण्ड द्वारा हाल के वर्षों में निरन्तर बेहतर प्रगति और विकास की गति बनाये रखने की सराहना करते हुए यकीन दिलाया कि केन्द्र के स्तर पर राज्य में बेहतर रेल तथा हवाई सेवाओं की सुविधाओं के विस्तार की मांग को मंजूर कराने में वह पूरी मदद देंगे। उन्होंने सलाह दी कि राज्य इन सेवाओं के लिए अपना प्रस्ताव षीघ्रता से उपलब्ध कराये। डाॅ0 आहलूवालिया ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में पूरे राष्ट्र में उत्तराखण्ड के बेहतर कार्य की भी सराहना की।
इससे पहले उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री डाॅ0 निषंक ने देष के हिमालयी राज्यों की विषम भौगोलिक परिस्थितियों और समस्याओं का विस्तार से उल्लेख करते हुए पुराने हिमालयी राज्यों तथा उत्तर-पूर्व के अषान्त राज्यों के मुकाबले उत्तराखण्ड की आवष्यकताओं को भारत सरकार द्वारा नजरअंदाज करने का उल्लेख करते हुए कहा कि पड़ोसी देश चीन द्वारा भारतीय सीमा तक रेलवे का विकास किया जा रहा है। वर्तमान में बीजिंग से ल्हासा तक रेल मार्ग सृजित हो चुका है तथा उत्तराखण्ड की सीमा के सन्निकट तकलाकोट तक इसका विस्तार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि संघर्ष या युद्ध की स्थिति में सीमा तक सेना एवं सैन्य सामग्री की पहुंच शीघ्रतापूर्वक सुनिष्चित हो सके, इस हेतु भारत सरकार को ऋषिकेष-कर्णप्रयाग, टनकपुर- बागेष्वर, बागेष्वर-कर्णप्रयाग रेलवे परिपथ के निर्माण कार्य शीघ्र किये जाने की आवश्यकता है। डाॅ0 निषंक ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य के विकास एवं राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से शिमला-त्यूणी-लोहाघाट हिमालयन हाइवे (भ्पउंसंलंद भ्पहीूंल) का निर्माण कराया जाना आवश्यक है। इस प्रकार की संस्तुति हिमालयी राज्यों एवं क्षेत्रों की समस्याओं पर योजना आयोग, भारत सरकार द्वारा गठित टास्क फोर्स ने भी अपनी रिपोर्ट में दी है। इसे शीघ्रता से कार्यरूप दिया जाये।
उत्तराखण्ड की चीन एवं नेपाल से क्रमशः 350 किमी0 एवं 275 किमी0 लम्बी अन्तर्राष्ट्रीय सीमायें खुली होने का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों के समेकित विकास के लिये बार्डर एरिया डेवलपमैन्ट प्लान के अन्तर्गत राज्य के सभी 26 सीमान्त विकासखण्डों के विकास हेतु तथा उन्हें सड़क, विद्युत, दूरसंचार सुविधाओं से जिला मुख्यालय से जोड़ने हेतु यह योजना लागू करने की मांग की।
इस मौके पर डाॅ0 निषंक ने अनुरोध किया कि उत्तराखण्ड में सभी केन्द्र पोषित योजनाओं का वित्त पोषण पूर्वोत्तर सीमान्त के राज्यों की भांति ही 90ः10 के अनुपात में किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उग्र और अषान्त क्षेत्रों को शान्त क्षेत्रों के मुकाबले अधिक महत्व दिये जाने के दोहरे मापदण्ड से गलत संकेत जाते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखण्ड को 2001-02 में विषेष श्रेणी राज्य का दर्जा दिया गया था, परन्तु वित्त पोषण के मामले में इस राज्य की भारी उपेक्षा की जाती है, जिसके परिमार्जन के लिए 2001-02 से 2010-11 तक की अवधि की अवषेष धनराषि 2400 करोड़ रुपए एकमुष्त विषेष पैकेज के रुप में स्वीकृत की जाय।
उन्हांेने कहा कि उत्तराखण्ड भी पूर्वोत्तर राज्यों की भांति विशेष श्रेणी का राज्य है। अतः राज्य में नैनी-सैनी (पिथौरागढ़) चिन्यालीसौड़ (उत्तरकाशी) तथा गौचर (चमोली), हवाई-अड्डों का विकास भी इसी फार्मूले पर शत-प्रतिशत अवस्थापना अनुदान के माध्यम से भारत सरकार के वित्त पोषण से किया जाना आवश्यक है, क्योंकि ये तीनों स्थल संवेदनशील अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर भी स्थित हैं, तथा इनका सामरिक महत्व भी है। डाॅ0 निषंक ने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची में रेलवे केन्द्रीय सूची का विषय है, इसके बावजूद उत्तराखण्ड सरकार पर रेलवे परियोजनाओं के लागत में 50 प्रतिषत की हिस्सेदारी वहन करने पर जोर डाला जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित मुजफ्फरनगर-रूड़की रेलमार्ग की निर्माण लागत भी शत्-प्रतिषत केन्द्र सरकार द्वारा वहन की जाये।
डाॅ0 निषंक ने बताया कि वर्ष 2010-11 में हुई रिकार्ड अतिवृष्टि के कारण विगत 10 वर्षो में राज्य ने जो परिसंपत्तियां एवं अवस्थापना सुविधायें सृजित की थीं वह बड़ी संख्या में ध्वस्त हो गई हैं। इसके साथ ही भारी भू-स्खलन के कारण 200 से अधिक गांव विनाश के कगार पर आ गये हैं, जिन्हें समय रहते अन्यत्र बसाया जाना आवश्यक है। इन्हें पुनस्र्थापित करने में लगभग 21000 करोड रूपये का व्यय अनुमानित है। इस प्राकृतिक विभीषिका को दृष्टिगत रखते हुए क्षतिग्रस्त योजनाओं की शीघ्र पुनस्र्थापना हेतु विशेष सहायता पैकेज दिया जाय।
मुख्यमंत्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि उत्तराखण्ड को विशेष केन्द्रीय सहायता ;ैब्।द्ध के रूप में 60 करोड़ रुपए तथा विशेष आयोजनागत सहायता ;ैच्।द्ध में 300 करोड़ रुपए ही आबंटित हुए। उन्होंने इस मामले में भी अपने राज्य को हिमाचल की भांति ही विशेष केन्द्रीय सहायता एवं विशेष आयोजनागत सहायता स्वीकृत करने की मांग की। उन्हांेने आगे कहा कि उत्तराखण्ड में लगभग 65 प्रतिशत भू-भाग वनाच्छादित है तथा मात्र 13 प्रतिशत भूमि कृषि के अन्तर्गत है। वन क्षेत्र की अधिकता के कारण विभिन्न विकास गतिविधियों को संचालित करने में अनेक बाधायें उत्पन्न होती हैं। उत्तराखण्डवासियों का वनों के विकास में जन सहभागिता करते हुए राज्य में 12089 वन पंचायतें गठित की है तथा राज्य गठन के उपरान्त वनाच्छादित क्षेत्रफल में 1141 वर्ग कि0मी0 क्षेत्रफल की वृद्धि हुई है। हाल में सम्पन्न बाघ गणना में राज्य में बाघों की संख्या में भी वृद्धि हुई है, जबकि अन्य प्रदेशों में स्थिति भिन्न है फिर भी वन्य जीव संरक्षण हेतु उत्तराखण्ड को केन्द्र से संरक्षण, संवर्द्धन तथा सहायता के साथ ही जो विषेष दर्जा दिया जाना चाहिए वह अभी तक अप्राप्त है।
मुख्यमंत्री डाॅ0 निषंक ने जोर देकर कहा कि योजना आयोग, भारत सरकार द्वारा तैयार की गयी पर्यावरण रिपोर्ट में उत्तराखण्ड को पर्यावरणीय सेवाओं के संरक्षण के लिए देश के सभी राज्यों में प्रथम स्थान पर रखा गया है जिससे इस राज्य द्वारा किये जा रहे प्रयासों की पुष्टि होती है। इसके विपरीत वन संरक्षण अधिनियम एवं पर्यावरण सरंक्षण से सम्बन्धित विभिन्न नियमों का बोझ केवल इसी राज्य की जनता पर अनावष्यक रुप से डाला जा रहा है जिससे विकास कार्य अवरूद्ध हो रहे है।
डाॅ0 निषंक ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य द्वारा दी जा रही प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से जीवनदायी पर्यावरणीय सेवाओं को वैज्ञानिक विधि से विभिन्न संस्थाओं द्वारा आंकलन किया गया है। इनके अनुसार राज्य द्वारा लगभग 35000 से 40000 करोड़ रुपए मूल्य की पारिस्थितिकीय सेवायें प्रतिवर्ष दी जानी आंकी गई है, जिनका लाभ देश ही नहीं अपितु विश्व को मिल रहा है। किन्तु इस पर्यावरण संरक्षण योगदान एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण सेवा के एवज में राज्य को किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति नहीं की जा रही है। साथ ही उत्तराखण्ड के नदी नालों से रेता-बजरी चुगान पर भी केन्द्र द्वारा प्रतिबन्ध लगाया गया जबकि इस प्रकार का चुगान नदी नालों को नियंत्रित करने में सहायक होता है। अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री डाॅ. निषंक ने प्राकृतिक वन सम्पदा के संरक्षण के लिए उत्तराखण्ड राज्य को प्रोत्साहन स्वरूप ग्रीन बोनस के रूप में प्रतिवर्ष 1000 करोड़ रूपये का विशेष पैकेज स्वीकृत करने की भी मांग की।
योजना आयोग के सम्मुख उत्तराखण्ड को प्रदत्त विशेष औद्योगिक पैकेज की अवधि 2013 से घटाकर मार्च 2010 में ही समाप्त करने का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इसके कारण राज्य में निवेषित धनराषि एवं लगभग दो लाख चैसठ हजार व्यक्तियों का रोजगार गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य में औद्योगिक तथा निवेष का वातावरण कायम रखने के लिए विषेष औद्योगिक सहायता पैकेज को पुनर्जीवित कर वर्ष 2020 तक बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लम्बी अवधि से विकसित राज्यों की शैशवस्था से गुजर रहे पिछड़ेपन के आधार पर गठित राज्य उत्तराखण्ड अर्थात समान से असमान की तुलना करना कदापि उचित नहीं है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सभी धर्मावलम्बियों के तीर्थों एवं धार्मिक स्थानों हेतु उत्तराखण्ड राज्य के प्रसिद्ध होने के कारण इस राज्य में असंख्य श्रद्धालुओं का आवागमन होता है और इनसे सम्बन्धित मूलभूत सुविधाओं, कानून व्यवस्था, सुरक्षा, पेयजल, स्वच्छता, चिकित्सा, यातायात, पार्किंग आदि व्यवस्थाओं हेतु योजना आयोग के स्तर उत्तराखण्ड को 500 करोड़ रुपए की सहायता दिये जाने पर विचार किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने केन्द्र सरकार द्वारा राज्य की अनेक निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक के कारण राज्य सरकार को हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति की मांग करते हुए ऐसे अवसरों की क्षतिपूर्ति के साथ ही 2000 मेगावाट विद्युत केन्द्रीय पूल से निःशुल्क उपलब्ध कराने की मांग भी की। उन्होंने उत्तराखण्ड के नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्रोतों के सूखने के कारण सदानीरा नदियों से पंम्पिंग योजनाओं के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराने के लिये निमार्णाधीन पम्पिंग योजनाओं को पूर्ण करने के लिए 500 करोड़ रुपए की विशेष केन्द्रीय सहायता पृथक से स्वीकृत किये जाने का अनुरोध किया।
मुख्यमंत्री डाॅ0 निशंक ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य के विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में अतिवृष्टि, भू-स्खलन से मोटर मार्गों का अवरूद्ध होना एवं सड़क दुर्घटनाओं से तत्काल निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा राज्य को दैवी आपदा राहत के लिए प्रतिवर्ष विशेष पैकेज के रूप में आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। उन्होने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य के पूर्व सैनिकों के कल्याण एवं उन्हें पुनः सेवायोजित करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा एक विशेष कार्ययोजना के तहत उत्तराखण्ड को एक अलग से पैकेज दिया जाना अपेक्षित है।मुख्यमंत्री डाॅ0 निषंक ने कहा कि वर्तमान में राज्य में प्राथमिक शिक्षा में नामांकन के सापेक्ष उच्च शिक्षा में नामांकन दर 10 प्रतिशत के लगभग है। मानक दर 33 प्रतिशत करने हेतु उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अवस्थापना सुविधाओं को सुदृढ़ किया जाना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु राज्य सरकार को केन्द्रीय सहायता की आवश्यकता है। उन्होने कहा कि राज्य की जटिल भोैगोलिक परिस्थितियों तथा वन विभाग से अनापत्ति लेने में होने वाले विलम्ब से बचने हेतु अनुरोध किया कि मुख्य वन संरक्षक, केन्द्रीय क्षेत्र को 10 हैक्टेयर की जगह 20 हैक्टेयर वन भूमि के स्थानान्तरण करने का अधिकार अनुमन्य किया जाये। मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम (मनरेगा) के प्रभावी एवं बेहतर प्रबन्धन के लिए इसके अन्तर्गत प्रषासनिक व्यय 6 प्रतिषत से बढ़ाकर 10 प्रतिषत किया जाना चाहिए। धनराषि अनेक किस्तों की बजाय दो किस्तों में जारी की जानी चाहिए। समाज के कमजोर वर्गों की माँग को ध्यान में रखते हुए 100 दिवसों के रोजगार की बजाय कम से कम 120 दिवसों का रोजगार दिया जाना चाहिए तथा परियोजना के अन्तर्गत सामग्री ;डंजमतपंसद्ध अंष को 40 प्रतिषत से बढ़ाकर 50 प्रतिषत किये जाने की आवष्यकता है। उन्होंने कहा कि त्वरित ऊर्जा विकास एवं सुधार परियोजना ;।च्क्त्च्द्ध के अन्तर्गत वर्तमान में 10 हजार से अधिक जनसंख्या के 31 नगर आच्छादित है। भारत सरकार से अनुरोध है कि राज्य की विरल जनसंख्या एवं छोटे कस्बों की बहुतायत को देखते हुए इस परियोजना के चयन हेतु जनसंख्या के मानक को 10 हजार से घटाकर 5 हजार किया जाय।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह वर्ष 11वीं पंचवर्षीय योजना का अन्तिम वर्ष है तथा आपके मार्गदर्शन में 12वीं पंचवर्षीय योजना का कार्य चल रहा है। अतः यह उचित अवसर होगा कि हमारे राज्य द्वारा अनुभूत समस्याओं का समुचित निराकरण किया जाय। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा बीपीएल परिवारों की लड़कियों की षिक्षा के लिए ‘‘गौरा देवी कन्या धन योजना’’ व गांवों के समग्र विकास के लिए प्रत्येक न्याय पंचायत में से एक ग्राम का चयन कर 670 ग्रामों में ‘‘अटल आदर्ष ग्राम योजना’’ प्रारम्भ की गई है। इसके अलावा राज्य के महत्वपूर्ण पर्यटक स्थलों को यातायात सुविधाओं से जोड़ने के विशेष प्रयास किये जा रहें हैं। इसके लिए सड़क निर्माण, रज्जु मार्गों का निर्माण, हैलीपैड्स की स्थापना तथा राज्य के हवाई-अड्डों के विस्तारीकरण पर जोर दिया जा रहा है ताकि उच्च आय-वर्ग के पर्यटक राज्य की ओर आकर्षित हो सकंे। उन्होंने कहा कि राज्य में 73वें संविधान संशोधन विधेयक के प्रावधानों के अनुरूप जनपद स्तरीय जिला नियोजन समितियों का गठन किया जा चुका है तथा चयनित प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर दी गई है।
डाॅ0 निषंक ने कहा कि वाह्य सहायतित परियोजनाओं, संसाधन आधारित केन्द्र पोषित योजनाओं, अन्य केन्द्रीय योजनाओं के राज्यांश की व्यवस्था, एवं जिला नियोजन समितियों द्वारा अनुमोदित योजनावार परिव्यय को सम्मिलित करते हुये राज्य संसाधन आधारित परिव्यय 6200 करोड़ रूपए के (प्रस्तावित) सापेक्ष लगभग 4136.45 करोड़ रूपए का परिव्यय वचनबद्ध मदों में प्रस्तावित है। अतः राज्य सेक्टर, जिसके अन्तर्गत क्षेत्रीय आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु अतिमहत्वपूर्ण अवस्थापना एवं सामाजिक क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करना होता है, उसके लिये थ्सवंजपदह परिव्यय अत्यधिक कम रह जाता है। अतः वार्षिक योजना पर अन्तिम अनुमोदन के समय इस बिन्दु पर विचार किया जाना चाहिए।
Monday, April 11, 2011
लाखों के जीवन रक्षक उपकरण बने शो-पीस।
रूद्रपुर के चिकित्सालय में मशीनों में लगी जंग।
नारायण परगांई। देहरादून। सरकारी अस्पातालों में जीवन रक्षक उपकराणों की उपयोग ना हो पाने के चलते हजारो मरीजों को इसका लाभ नही मिल पा रहा। कांग्रेस शासन काल में खरीदे गए उपकराणों के कारण 1355 मरीजो को चिकित्सा सुविधाओ का लाभ नही मिल पाया जिस कारण दूसरे स्थानो पर जाकर अपना इलाज करवाना पड़ा यही नही अप्रैल 2006 से जुलाई 2009 तक मरीजों को दूर दराज इलाज कराने में भारी परेशानियों का सामना भी करना पड़ा। मशीनो ंका संचालन ना हो पाने के कारण नौ श्रेणियों की 12 जीवन रक्षक मशीनें 3 वर्ष की वारंटी समाप्त होने के चलते सरकार को करीब 85 लाख की लागत देनेके बाद भी मरीजो को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नही हो सकी। सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 85 लाख की जीवन रक्षक उपकरणों का 4 साल से अधिक समय तक उपयोग ना होने के कारण रोगियों को इसका लाभ नही मिल सका जबकि वर्ष 2002 एवं 03 में सरकार ने चिकित्सा प्र्रबन्ध समीति का गठन किया था जिसका उद्देश्य सरकार से प्राप्त उपकरणों का रखरखाव एवं संचालन करना था। इतना ही नही प्रत्येक 3 माह में एक बार बैठक आयोजित कर पैरामैडिकल स्टाफ की नियुक्ति तथा संविदा पर सेवाओ का प्रबन्ध करने के साथ साथ चिकित्सक व कर्मचारियों के लिए कार्यशालाओ का आयोजन भी करना था लेकिन मुख्यचिकित्सा अधीक्षक जवाहरलाल नेहरू जिला चिकित्सालय रूद्रपुर के कार्यालय की अगस्त 2009 की लेखा परीक्षा के दौरान यह पाया गया कि 85 लाख की 12 जीवन रक्षक मशीने दिसम्बर 2005 से मई 2006 के बीच चिकित्सालय को आपूर्ति की गई थी लेकिन उपकरणो को ना तो स्थापित किया गया और ना ही इनका संचालन किया गया जिस कारण मई 2010 तक चिकित्सालय में यह मशीने बिना उपयोग के ही पड़ी हुई थी यहां तक कि संविदा पर कर्मचारियो व मैडिकल सटाफ को लेने तक कि कोशिश नही की गई और विशेषज्ञों की नियुक्ति भी ना होने के व चलते इन सेवाओ का लाभ मरीजों को नही मिल सका। रिपोर्ट में गठन के उद्दश्यों की अनदेखी करने एवं सरकार के निर्देशों की अवहेलना करने के फलस्वरूप सामान्य जनता को 85 लाख की जीवन रक्षक मशीनो के उपलब्ध होने के बाद भी इसका लाभ नही मिल सका। जबकि मशीनोे के उपयोग ना करने के कारण परिचालन की स्थिति समय व्यतीत होने के साथ साथ वारंटी अवधि समाप्त हो जाने के कारण खराब हो रही थी। दिसम्बर 2009 में मुख्य चिकित्सक ने स्वीकार किया कि जगह की कमी तकनिशियनों की कमी के कारण उपकरणोे की स्थापना नही की जा सकी। और अध्यक्ष सहित सभी सदस्यों की एक साथ उपलब्धता ना होने कारण बैठक भी संचालित नही की जा सकी प्रबंधन के उदासीन रवैये के कारण निष्क्रिय पड़े उपकरणें से उद्देश्यों की पूर्ति नही हो सकी जिस कारण उपकरणोे से मरीज लाभान्वित नही हुए। उपप्रकरण शासन को मई 2010 में भेजा गया था जिस पर अभी तक कोई कार्यवाही नही हो पायी है। कुल मिलाकर लाखों रूपये के खरीदे गए उपकरणो का लाभ रूद्रपुर की जनता को नही मिल पाया है। अधिकारियो की लापरवाही के कारण जहां सरकार के पैसे का नुकसान हुआ हेै वही चिकित्सा विभाग भी इसे सुचारू करने में फिसड्डी साबित हुआ है। इस बारे में जब रूद्रपुर के सीएमएस जे सी दुर्गापाल से बात की गई तो साफ कहना था कि स्टाफ की नियुक्ति ना हो पाने के कारण मशीनों ा संचालन नही हो पा रहा है और पूरा मामला शासन के संज्ञान में है।
Subscribe to:
Posts (Atom)