दुनिया भर में तेजी से पांव पसारते जा रहे एड्स का इलाज इससे बचाव में ही है। इस स्थिति की भयावहता का ही
यह परिणाम है कि एचआईवी पॉजिटिव होने का मतलब आमतौर पर जिंदगी का अंत मान लिया जाता है, लेकिन यह अधूरा सच है। अगर डॉक्टरों की सलाह के मुताबिक चला जाए तो एचआईवी पॉजिटिव लोग भी लंबे समय तक सामान्य जीवन जी सकते हैं। एचआईवी और एड्स पर विशेषज्ञों से बात करके पूरी जानकारी दे रहे हैं प्रभात गौड़ क्या है एचआईवी और एड्स ? एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनोडिफिशिएंसी वायरस) एक ऐसा वायरस है, जिसकी वजह से एड्स होता है। यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलता है। जिस इंसान में इस वायरस की मौजूदगी होती है, उसे हम एचआईवी पॉजिटिव कहते हैं। आमतौर पर लोग एचआईवी पॉजिटिव होने का मतलब ही एड्स समझने लगते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल, होता यह है कि एचआईवी के शरीर में प्रवेश कर जाने के बाद शरीर की प्रतिरोधक क्षमता (बीमारियों से लड़ने की क्षमता) धीरे-धीरे कम होने लगती है। प्रतिरोधक क्षमता कम होने से शरीर पर तमाम तरह की बीमारियां और इन्फेक्शन पैदा करने वाले वायरस आदि अटैक करने लगते हैं। एचआईवी पॉजिटिव होने के करीब 8 से 10 साल बाद इन तमाम बीमारियों के लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं। इस स्थिति को ही एड्स कहा जाता है। वैसे, एचआईवी पॉजिटिव होने के बाद से एड्स होने तक के वक्त को दवाओं की मदद से बढ़ाया जा सकता है और कुछ बीमारियों को ठीक भी किया जा सकता है। जाहिर है, एचआईवी पॉजिटिव होना या एड्स अपने आप में कोई बीमारी नहीं हैं, बल्कि इसकी वजह से बीमारियों से लड़ने की शरीर की क्षमता कम हो जाती है और तमाम बीमारियां अटैक कर देती हैं। ................................................एचआईवी दो तरह का होता है - एचआईवी-1 और एचआईवी-2। एचआईवी-1 पूरी दुनिया में पाया जाता है और भारत में भी 80 फीसदी मामले इसी के हैं। एचआईवी-2 खासतौर से अफ्रीका में मिलता है। भारत में भी कुछ लोगों में इसका इन्फेक्शन देखा गया है। कुछ लोगों को दोनों वायरस की वजह से इन्फेक्शन होता है। वैसे, एचआईवी-2 इन्फेक्शन वाले लोग एचआईवी-1 वालों से ज्यादा जीते हैं। मां से बच्चे में एचआईवी-2 ट्रांसफर होने के चांस न के बराबर होते हैं। शरीर में घुसने के बाद यह वायरस वाइट ब्लड सेल्स पर अटैक करता है और धीरे-धीरे उन्हें मारता रहता है। इन सेल्स के खत्म होने के बाद इन्फेक्शन और बीमारियों से लड़ने की हमारे शरीर की क्षमता कम होने लगती है। नतीजा यह होता है कि आए दिन शरीर में तमाम तरह के इन्फेक्शन होने लगते हैं। एचआईवी इन्फेक्शन की यह लास्ट स्टेज है और इसी स्टेज को एड्स कहा जाता है। ऐसे फैल सकता है एचआईवी पॉजिटिव पुरुष या महिला के साथ अनसेफ (कॉन्डम यूज किए बिना) सेक्स से, चाहे सेक्स होमोसेक्सुअल ही क्यों न हो। संक्रमित (इन्फेक्टेड) खून चढ़ाने से। एचआईवी पॉजिटिव महिला से पैदा हुए बच्चे में। बच्चा होने के बाद एचआईवी ग्रस्त मां के दूध पिलाने से भी इन्फेक्शन फैल सकता है। खून का सैंपल लेने या खून चढ़ाने में डिस्पोजेबल सिरिंज (सिर्फ एक ही बार इस्तेमाल में आने वाली सुई) न यूज करने से या फिर स्टर्लाइज किए बिना निडल और सिरिंज का यूज करने से। हेयर ड्रेसर (नाई) के यहां बिना स्टर्लाइज्ड (रोगाणु-मुक्त) उस्तरा, पुराना इन्फेक्टेड ब्लेड यूज करने से। सलून में इन्फेक्टेड व्यक्ति की शेव में यूज किए ब्लेड से। सलून में हमेशा नया ब्लेड यूज हो रहा है, यह इंशुअर करें। ऐसे नहीं फैलता चूमने से। लेकिन अगर किसी व्यक्ति को एड्स है और उसके मुंह में कट या मसूड़े में सूजन जैसी समस्या है, तो इस तरह के व्यक्ति को चूमने से भी एड्स फैल सकता है। यानी एड्स का संक्रमण चूमने पर भी फैल सकता है, अगर सावधानी न बरती जाए। हाथ मिलाना, गले मिलना, एक ही टॉयलेट को यूज करना, एक ही गिलास में पानी पीना, छीकने, खांसने से इन्फेक्शन नहीं फैलता। एचआईवी शरीर के बाहर ज्यादा देर तक नहीं रह सकता, इसलिए यह खाने और हवा से भी नहीं फैलता। रक्तदान करने से बशर्ते खून निकालने में डिस्पोजेबल (इस्तेमाल के बाद फेंक दी जाने वाली) सुई का इस्तेमाल किया गया हो। मच्छर काटने से। टैटू बनवाने से, बशर्ते इस्तेमाल किए जा रहे औजार स्टर्लाइज्ड हों। डॉक्टर या डेंटिस्ट के पास इलाज कराने से। ये लोग भी आमतौर पर स्टरलाइज्ड औजारों का ही इस्तेमाल करते हैं। इनके जरिए पहुंचता है वायरस ब्लड सीमेन (वीर्य) वैजाइनल फ्लूइड (स्त्रियों के जननांग से निकलने वाला दव) ब्रेस्ट मिल्क शरीर का कोई भी दूसरा फ्लूइड, जिसमें ब्लड हो मसलन, बलगम इनसे भी फैल सकता है एड्स (इनके संपर्क में अक्सर मेडिकल पेशे से जुड़े लोग ही आते हैं) दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड के इर्द-गिर्द रहने वाला दव हड्डी के जोड़ों के आसपास का दव भ्रूण के आसपास का दव इन दवों से नहीं होता हालांकि लार (सलाइवा), यूरिन और आंसुओं में भी इक्का-दुक्का मामलों में एचआईवी पाया गया है, लेकिन अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है, जिसके आधार पर इन दवों से एचआईवी फैलने की पुष्टि हो। कौन कराए टेस्ट टेस्ट कराएं अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि कभी वह एचआईवी के संपर्क में आ गया होगा। पिछले 12 महीनों के दौरान अगर एक से ज्यादा पार्टनर के साथ उसके सेक्स संबंध रहे हों। अपने पार्टनर के सेक्सुअल बिहेवियर को लेकर वह निश्चिंत न हो। वह पुरुष हो और उसने कभी किसी पुरुष के साथ अनसेफ सेक्स किया हो। उसे एसटीडी (सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज) हो। वह हेल्थ वर्कर हो, जो ब्लड आदि के सीधे संपर्क में आता हो। वह प्रेग्नेंट हो। ये लक्षण हैं तो शक करें एचआईवी से ग्रस्त इंसान शुरू में बिल्कुल नॉर्मल और सेहतमंद लगता है। कुछ साल बाद ही इसके लक्षण सामने आते हैं। अगर किसी को नीचे दिए गए लक्षण हैं, तो उसे एचआईवी का टेस्ट कराना चाहिए : एक महीने से ज्यादा समय तक बुखार बने रहना, जिसकी कोई खास वजह भी पता न चले। बिना किसी वजह के लगातार डायरिया बने रहना। लगातार सूखी खांसी। मुंह में सफेद छाले जैसे निशान होना। बिना किसी वजह के लगातार थकान बने रहना और तेजी से वजन गिरना। याददाश्त में कमी, डिप्रेशन आदि। (नोट : ये सभी लक्षण किसी साधारण बीमारी में भी हो सकते हैं। ) एचआईवी के लिए मेडिकल टेस्ट किसी को एचआईवी इन्फेक्शन है या नहीं, यह पता करने का अकेला तरीका यही है कि उस इंसान का ब्लड टेस्ट किया जाए। लक्षणों के आधार पर शक किया जा सकता है, लेकिन यह पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि एचआईवी है या नहीं, क्योंकि एचआईवी के लक्षण किसी दूसरी बीमारी के लक्षण भी हो सकते हैं। कई मामलों में ऐसा भी होता है कि एचआईवी पॉजिटिव होने के बाद कई साल तक कोई लक्षण सामने नहीं आता। एचआईवी टेस्ट और काउंसलिंग के लिए सरकार ने पूरे देश में 5 हजार इंटिग्रेटेड काउंसलिंग एंड टेस्टिंग सेंटर (आईसीटीसी) बनाए हैं। इन सेंटरों पर व्यक्ति की काउंसलिंग और उसके बाद बाजू से खून लेकर जांच की जाती है। यह जांच फ्री होती है और रिपोर्ट आधे घंटे में मिल जाती है। आमतौर पर सभी जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और कुछ कम्यूनिटी हेल्थ सेंटरों पर यह सुविधा उपलब्ध है। यहां पूरी जांच के दौरान व्यक्ति की आइडेंटिटी गुप्त रखी जाती है। पहले रैपिड या स्पॉट टेस्ट होता है, लेकिन इस टेस्ट में कई मामलों में गलत रिपोर्ट भी पाई गई हैं। इसलिए स्पॉट टेस्ट में पॉजिटिव आने के बाद व्यक्ति का एलाइजा टेस्ट किया जाता है। एलाइजा टेस्ट में कन्फर्म होने के बाद व्यक्ति को एचआईवी पॉजिटिव होने की रिपोर्ट दे दी जाती है। एचआईवी कन्फर्म हो जाने के बाद मरीज को इलाज के लिए एआरटी सेंटर पर भेजा जाता है। पूरे देश में ऐसे करीब 280 एआरटी सेंटर हैं। इन सेंटरों पर इलाज शुरू करने से पहले व्यक्ति का एक और ब्लड टेस्ट किया जाता है, जिसमें उसकी सीडी-4 सेल्स की संख्या का पता लगाया जाता है। अगर यह संख्या 250 से कम है तो व्यक्ति का फौरन इलाज शुरू कर दिया जाता है और अगर उससे ज्यादा है तो डॉक्टर उसे कुछ दिन बाद आने की सलाह दे सकते हैं। इन सेंटरों पर भी काउंसिलर भी होते हैं, जो इलाज के साथ-साथ व्यक्ति की काउंसलिंग भी करते हैं। इलाज फ्री होता है और व्यक्ति की पहचान गुप्त रखी जाती है। दिल्ली की बात करें तो यहां आरएमएल, एलएनजेपी, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, एम्स, सफदरजंग जैसे सभी बड़े सरकारी अस्पतालों में ट्रीटमेंट सेंटर और टेस्टिंग सेंटर हैं। एलएनजेपी में ओपीडी के रूम नंबर 32 में ट्रीटमेंट सेंटर है और मौलाना आजाद के रूम नंबर 281 में टेस्टिंग सेंटर काम कर रहा है। इसी तरह दूसरे अस्पतालों में भी ये सेंटर्स काम कर रहे हैं। ट्रीटमेंट सेंटर्स पर आईसीटीसी (सरकारी टेस्टिंग सेंटर) की रिपोर्ट को मान्यता दी जाती है। प्राइवेट लैब में सिर्फ डॉ. लाल और रैनबैक्सी लैब्स की रिपोर्टों को ही मान्यता दी जाती है। इसके अलावा अगर कहीं से कोई एचआईवी टेस्ट रिपोर्ट लेकर ट्रीटमेंट सेंटर जाता है तो उसे दोबारा आईसीटीसी पर टेस्ट कराने को बोला जाता है। ज्यादातर मामलों में एचआईवी इन्फेक्शन हो जाने के दो हफ्ते के बाद टेस्ट कराने पर ही टेस्ट में इन्फेक्शन आ पाता है, उससे पहले नहीं। कई बार इसमें छह महीने भी लग जाते हैं। ऐसे में अगर किसी को लगता है कि उसका कहीं एचआईवी के प्रति एक्सपोजर हुआ है और फौरन टेस्ट कराता है, तो टेस्ट का रिजल्ट नेगटिव भी आ सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उस व्यक्ति को इन्फेक्शन नहीं हो सकता। ध्यान रखें कि एचआईवी को शरीर में एक्टिव होने में छह महीने तक लग सकते हैं। इसलिए छह महीने बाद एक बार फिर टेस्ट कराना चाहिए। छह महीने बाद भी अगर नेगेटिव आता है तो आप खुद को सेफ मान सकते हैं। शरीर में वायरस की एंट्री से लेकर उसके एक्टिव होने तक के समय को विंडो पीरियड कहा जाता है। इस पीरियड में एचआईवी का टेस्ट से भी पता भले ही न चलता हो, लेकिन जिसके शरीर में वायरस है वह इसे दूसरे को ट्रांसफर जरूर कर सकता है। एड्स का इलाज एचआईवी का कोई इलाज नहीं है। एक बार शरीर में आ जाने के बाद वायरस ताउम्र शरीर में रहता है। फिर भी दवाओं की मदद से एचआईवी पॉजिटिव होने से लेकर एड्स होने तक के गैप को बढ़ाया जा सकता है। कोशिश की जाती है कि व्यक्ति ज्यादा लंबे समय तक बीमारियों से बचा रहे। एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति को इलाज के दौरान एंटी-रेट्रोवायरल ड्रग्स दिए जाते हैं। एजेडटी, डीडीएल, डीडीसी कुछ कॉमन ड्रग्स हैं, लेकिन इनका असर कुछ ही वक्त के लिए होता है। फिर ये बेहद महंगी भी होती हैं। वैसे, डब्ल्यूएचओ की पॉलिसी यह है कि एंटी-रेट्रोवायरल ड्रग्स के बजाय एचआईवी की वजह से होने वाले इन्फेक्शन जैसे टीबी और डायरिया का क्लिनिकल मैनेजमेंट किया जाए। होम्योपैथी होम्योपैथी का बेसिक ही यह है कि बीमारियों से नहीं लड़ा जाता, बल्कि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाया जाता है। होम्योपैथिक विशेषज्ञ एड्स का इलाज करते वक्त शरीर के इम्युनिटी लेवल को बढ़ाने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा एड्स में होने वाले इन्फेक्शन जैसे हर्पीज, डायरिया, बुखार आदि का इलाज किया जाता है। एड्स के मरीजों में मानसिक तनाव दबाव भी अक्सर देखने को मिलता है। होम्योपैथिक इलाज के दौरान इसका भी इलाज किया जाता है। होम्योपैथिक विशेषज्ञों का कहना है कि एड्स के इलाज में उन्हें बहुत अच्छे रिजल्ट मिले हैं। होम्योपैथी में भी बीमारी पूरी तरह से ठीक नहीं होती। बस उसके बढ़ने की रफ्तार कम हो जाती है। योग योगाचार्यों के मुताबिक अगर नीचे दिए गए प्राणायाम नियम से किए जाएं तो बीमारी के बढ़ने की गति को धीमा किया जा सकता है : कपालभाति प्राणायाम 7 मिनट तक फिर अनुलोम-विलोम प्राणायाम 10 मिनट तक और फिर भस्त्रिका 3 मिनट तक करें। ओम का जाप 11 बार करें। यह पूरा सेट दिन में दो बार करें। एड्स के साथ जिंदगी एचआईवी पॉजिटिव पाए जाने का मतलब यह नहीं है कि जिंदगी में कुछ नहीं रहा। एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति भी आम लोगों की तरह जिंदगी जी सकते हैं। फिर भी ऐसे लोगों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए : अपने डॉक्टर से मिलकर एचआईवी इन्फेक्शन से संबंधित अपना पूरा मेडिकल चेकअप कराएं। टीबी और एसटीडी का चेकअप भी जरूर करा लें। डॉक्टर की सलाह के मुताबिक दवाएं लें। महिलाएं थोड़े-थोड़े दिनों बाद अपनी गाइनिकॉलिजकल जांच कराती रहें। अपने पार्टनर को इस बारे में बता दें। दूसरे लोग वायरस से प्रभावित न हों, इसके लिए पूरी तरह से सावधानी बरतें। अल्कोहल और ड्रग्स का इस्तेमाल बंद कर दें। अच्छी पौष्टिक डाइट लें और टेंशन से दूर रहें। नजदीकी लोगों से मदद लें और वक्त-वक्त पर प्रफेशनल काउंसलिंग कराते रहें। ब्लड, प्लाज्मा, सीमेन या कोई भी बॉडी ऑर्गन डोनेट न करें। प्रेग्नेंट महिलाएं और एड्स एचआईवी प्रेग्नेंट महिलाओं से उनके बच्चों में पहुंच जाता है, लेकिन ऐसा केवल एक तिहाई मामलों में ही होता है। हर प्रेग्नेंट महिला को अपना एचआईवी टेस्ट जरूर कराना चाहिए। कई महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान एचआईवी इन्फेक्शन का पता चलने पर अबॉर्शन का फैसला लेती हैं। यह पूरी तरह से पर्सनल चॉइस है, हालांकि डॉक्टर ऐसी महिलाओं को बच्चा न गिराने की सलाह देते हैं। ऐसी महिलाओं को डॉक्टर से लगातार सलाह करनी चाहिए। डिलिवरी से पहले मां को और बच्चा होते ही बच्चे को नेवरीपिन नाम की दवा की एक डोज दे दी जाती है। इससे बच्चे के पॉजिटिव होने की आशंका एक तिहाई की भी एक तिहाई रह जाती है। जन्म लेने के बाद बच्चे का एचआईवी टेस्ट किया जा सकता है, लेकिन इससे यह पता नहीं लग सकता कि बच्चे को इन्फेक्शन है या नहीं, क्योंकि यह टेस्ट एचआईवी एंटीबॉडी टेस्ट होता है और एचआईवी पॉजिटिव मां से पैदा होने वाले हर बच्चे के शरीर में जन्म के वक्त एचआईवी एंटीबॉडी होते ही हैं। इनमें से जो बच्चे एचआईवी पॉजिटिव नहीं होते, वे डेढ़ साल की उम्र तक एचआईवी एंटीबॉडी छोड़ देते हैं। ऐसे में 18 महीने के बाद ही बच्चे का टेस्ट कराया जाए तो अच्छा है। वैसे, पीसीआर टेस्ट से तीन महीने के बच्चे के बारे में भी पता लग जाता है कि वह एचआईवी पॉजिटिव है या नहीं। बच्चा हो जाने के बाद एचआईवी से ग्रस्त मां को बच्चे को अपना दूध नहीं पिलाना चाहिए। अगर कोई महिला एचआईवी पॉजिटिव है, तो वह कंसीव (गर्भधारण) कर सकती है। वैसे, कुछ डॉक्टरों का मानना है कि एचआईवी महिला प्रेग्नेंट होने के बाद ज्यादा बीमार हो सकती है। सेफ ब्लड का मामला संक्रमित खून भी एचआईवी इन्फेक्शन की एक वजह होती है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि जो ब्लड चढ़ाया जा रहा है, वह संक्रमित न हो। नैको के नैशनल ब्लड सेफ्टी प्रोग्राम के मुताबिक सभी ब्लड बैंकों के लिए ब्लड के हर यूनिट को टेस्ट करना अनिवार्य है। ट्रांसफ्यूजन के लिए इशू करने से पहले इस ब्लड को एचआईवी, सिफलिस, हिपेटाइटिस बी व सी व मलेरिया के लिए टेस्ट किया जाता है। पिछले दिनों एम्स के एक सर्वे से सामने आया कि एलाइसा टेस्ट (इस टेस्ट के बाद ही ब्लड बैंक ब्लड को चढ़ाने के लिए ओके करते हैं) होने के बावजूद ब्लड में हिपेटाइटिस बी और सी या एचआईवी इन्फेक्शन होने की आशंका रह जाती है, भले ही ऐसा बहुत कम मामलों में होता है। कहने का मतलब यह हुआ कि एलाइजा टेस्ट होने के बाद जो खून आमतौर पर लोगों को चढ़ाया जाता है, वह हिपेटाइटिस और एचआईवी इन्फेक्शन से पूरी तरह सुरक्षित नहीं भी हो सकता है। इसके बाद सरकार की ओर से देश भर में ऐसी व्यवस्था लागू करने की बात कही गई है, जिसमें ट्रांसफ्यूजन करने से पहले ब्लड का न्यूक्लिक एसिड टेस्ट (एनएटी) भी किया जाएगा। इस टेस्ट के बाद ब्लड को पूरी तरह सुरक्षित माना जा सकता है। फिलहाल एम्स और राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इसे शुरू कर दिया गया है। वैसे कुछ प्राइवेट हॉस्पिटल पहले से ही इस टेस्ट को करने के बाद ही मरीज को ब्लड चढ़ाते हैं, जिसके लिए अलग से चार्ज किया जाता है। मरीज की पूरी सेफ्टी के लिए ब्लड चढ़वाने से पहले यह पक्का किया जाए कि उस ब्लड का एनएटी टेस्ट हुआ हो। जरूरी सवाल-जवाब दो एचआईवी पॉजिटिव लोग क्या आपस में सेक्स कर सकते हैं? कॉन्डम के साथ कर सकते हैं। अनसेफ सेक्स न करें, नहीं तो कुछ और भी इन्फेक्शन होने की आशंका है। कंडोम कई मामलों में फेल भी हो जाते हैं। फिर तो कॉन्डम के साथ सेक्स करने से भी एचआईवी इंफेक्शन हो सकता है? सही क्वॉलिटी का कॉन्डम सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तब ही कंडोम एचआईवी से बचाव करता है। अगर कॉन्डम फट जाए या गलत तरीके से यूज किया जाए तो इससे इन्फेक्शन होने की आशंका रहती है। क्या ऐसे एक से ज्यादा लोगों के साथ अनसेफ सेक्स किया जा सकता है, जो सौ फीसदी श्योर हैं कि उन्हें एचआईवी नहीं है? एचआईवी न होने की सौ फीसदी गारंटी बेहद मुश्किल है इसलिए एक ही पार्टनर के साथ संबंध बनाने चाहिए या दूसरे पार्टनर के साथ सेक्स करने पर कॉन्डम यूज करना चाहिए। वैसे, अगर सौ फीसदी गारंटी मिल जाती है, तो फिर एचआईवी होने की आशंका नहीं है। क्या फीमेल कॉन्डम एड्स रोकता है? रोकता है, लेकिन यह उतना विश्वसनीय नहीं है जितना मेल कॉन्डम। अगर फीमेल पार्टनर अपने मेल पार्टनर को कॉन्डम यूज करने के लिए तैयार नहीं कर पा रही है, तो फिर फीमेल कॉन्डम का ऑप्शन अपनाया जाना ठीक है। क्या एड्स एसटीडी है? एसटीडी वह होते हैं जो सिर्फ सेक्सुअली कॉन्टैक्ट में आने से फैलते हैं। एड्स सेक्स के जरिए फैलता है, मगर इसके अलावा भी इसका इन्फेक्शन कई और तरीकों से फैल सकता है। इसलिए एड्स को एसटीडी न मानना ही तर्कसंगत है। अगर एसटीडी है तो क्या एड्स के चांस ज्यादा होते हैं? अगर एसटीडी है, तो एचआईवी इन्फेक्शन होने की आशंका बढ़ जाती है। एसटीडी अगर सिफलिस, कैंक्रॉइड्स, जेनिटल हपीर्ज या गोनोरिया है, तब यह आशंका बहुत ज्यादा होती है। अनसेफ एनल सेक्स करने से एड्स हो सकता है? अनसेफ एनल सेक्स करने से दोनों में किसी भी पार्टनर को एचआईवी हो सकता है, इसलिए कॉन्डम का इस्तेमाल जरूर करें। अगर एक पार्टनर का टेस्ट एचआईवी नेगेटिव आता है तो क्या दूसरा पार्टनर भी नेगटिव होगा? कोई जरूरी नहीं है। एक पार्टनर का नेगेटिव होना इस बात की गारंटी नहीं है कि दूसरा पार्टनर भी नेगेटिव होगा। एक्सपर्ट्स पैनल मयंक अग्रवाल, जॉइंट डायरेक्टर, नैशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (नैको) डॉ. अजय खेड़ा, असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल, नैको डॉ. टी. डी. चुघ, सीनियर फिजीशियन, सर गंगाराम हॉस्पिटल डॉ. अनिल कुमारी, प्रिंसिपल, नेहरू होम्योपैथिक कॉलेज सुरक्षित गोस्वामी, योग गुरु
Wednesday, December 2, 2009
Thursday, November 26, 2009
यौन शोषण की शिकायतों को दबाने व सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों की धज्जियाँ
यौन शोषण की शिकायतों को दबाने व सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाने में माहिर पिटकुल अधिकारियों द्वारा अपनाये गये हथकण्डों का खुलासा करने में सूचना का अधिकार एक धारदार हथियार साबित हुआ।
सूचना का अधिकार के तहत, २६ मई २००९ को पिटकुल में प्राप्त यौन शोषण सम्बन्धी शिकायतों पर कृत कार्यवाही का ब्यौरा व जाँच समिति के सदस्यों के नाम व पदनाम मांगे जाने से अधिकारियों में हड़कंप मच गय तथा परिणाम स्वरुप नयी कमेटी का गठन १२ जून २००९ को कर दिया गया जिसका अध्यक्ष उत्तराखण्ड राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा को बनाया गया है।
अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेज़ों ने पिटकुल अधिकारियों द्वारा प्रकरण को दबाने की कलई खोल दी।
इस प्रकरण में कई शर्मनाक पहलू उजागर हुए जो निम्न प्रकार हैं :-१) ९ जनवरी २००७ को एक महिला अवर अभियन्ता द्वारा एक पुरुष अवर अभियन्ता पर यौन शोषण का आरोप लगाया।२) शिकायत पर कार्यवाही करते हुए १२ जनवरी २००९ को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए जाँच एकल समिति (पुरुष) को सौंप दी जबकि जांच समिति में कम से कम तीन सदस्य तथा अध्यक्ष व आधे सद्स्य महिलाये होनी चाहिय थी(सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशाका बनाम रजास्थान राज्य)
३)जाँच आधिकरी उपमहाप्रबन्धक कमल कान्त ने जाँच शुरु की किन्तु पी.सी.ध्यनी की युनियन व फ़ोन पर मिली धमकी के चलते जाँच आधिकरी नेजाँच से इन्कार किया(पत्राँक १९८/ई टी सी आर/इन्क्वायरी दि. १६/०१/०७)
४) प्रबन्ध निदेशक ने पत्राँक १७८/प्र. नि./पिटकुल/ई-११ दिनाँकित २० जनवरी २००७ को पुनः सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए तीन सदस्यीय (तीनों पुरुष) समिति का गठन किया गया।
५) इस समिति का अध्यक्ष जे. पी. तोमर लगभग डेढ वर्ष पूर्व सेवा निवृत्त हो चुका है।
६) २६ मई २००९ तक सूचना के अधिकार के तहत सूचना माँगे जाने तक मामला लगभग २ वर्ष ६ माह तक लम्बित रहा ।
७) १२ मई २००९ को नई जांच समिति का गठन किया गया जिसका अध्यक्ष राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा को बनाया गया है।
८) नई समिति के गठन तक दोनों पक्षों में कोई समझौता हुआ था। इस समिति के गठन के बाद एक जनसेवक द्वारा इस प्रकरण को नई समिति के सुपुर्द करने हेतु पिटकुल अधिकारियों को एक ज्ञापन दिया गया।
९) उक्त ज्ञापन से पिटकुल अधिकारियों में एक बार फ़िर हड़कंप मच गया और आनन फ़ानन मे पुरानी जाँच समिति के सदस्यों के समक्ष दोनों पक्षों मे. १३ जुलाई २००९ को समझौता दर्शाया गया है जो कानूनी रूप से अवैध है।
यहाँ गौरतलब है कि यौन शोषण की शिकायत को ९० दिनों के भीतर निस्तारित करने के बजाय लगभग ढाई वर्ष तक लम्बित रखा गया। इसके पीछे क्लर्क से वरिष्ठ प्रबन्धक बने कर्मचारी व अधिकारि युनियन के अध्यक्ष पी.सी.ध्यानी ही हैं क्योंकि आरोपित अधिकारी ध्यानी की युनियन का न केवल सक्रिय सदस्य है बल्कि ध्यानी का एक मोहरा है जो ध्यानी के लिए कुछ भी कर सकता है।
अब प्रश्न उठता है कि लगभग ढाई वर्षों तक न्याय की राह देखने वाली महिला अधिकारी ने अचानक समझौता कैसे कर लिया । विभाग से छ्न कर आने वाली खबरों को यदि सच माना जाये तो उक्त महिला अधिकारी ने एक लाख रुपये तथा पति के स्थानान्तरण के आश्वासन के बाद ही समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं ।
यदि इसमें ज़रा सी भी सच्चाई है तो निश्चित रुप से यह एक कलंक से कम नहीं क्योंकि कुछ महिलायें किसी पुरुष अधिकारी पर आरोप लगाकर अपना हित साध सकती हैं किन्तु इसक एक दूसरा पहलू भी है कि एक जूनियर अधिकारी अपने ही विभाग से उलझने की हिम्मत नहीं कर सकती और अधिकारियों के दबाव के चलते उसने इस समझौते पर हस्ताक्षर किये हों ।
चाहे जो भी पहलू हों किन्तु इस प्रकरण को पुनः जाँच कमेटी को सुपुर्द करके निष्पक्ष जाँच करायी जाए
सूचना का अधिकार के तहत, २६ मई २००९ को पिटकुल में प्राप्त यौन शोषण सम्बन्धी शिकायतों पर कृत कार्यवाही का ब्यौरा व जाँच समिति के सदस्यों के नाम व पदनाम मांगे जाने से अधिकारियों में हड़कंप मच गय तथा परिणाम स्वरुप नयी कमेटी का गठन १२ जून २००९ को कर दिया गया जिसका अध्यक्ष उत्तराखण्ड राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा को बनाया गया है।
अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेज़ों ने पिटकुल अधिकारियों द्वारा प्रकरण को दबाने की कलई खोल दी।
इस प्रकरण में कई शर्मनाक पहलू उजागर हुए जो निम्न प्रकार हैं :-१) ९ जनवरी २००७ को एक महिला अवर अभियन्ता द्वारा एक पुरुष अवर अभियन्ता पर यौन शोषण का आरोप लगाया।२) शिकायत पर कार्यवाही करते हुए १२ जनवरी २००९ को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए जाँच एकल समिति (पुरुष) को सौंप दी जबकि जांच समिति में कम से कम तीन सदस्य तथा अध्यक्ष व आधे सद्स्य महिलाये होनी चाहिय थी(सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशाका बनाम रजास्थान राज्य)
३)जाँच आधिकरी उपमहाप्रबन्धक कमल कान्त ने जाँच शुरु की किन्तु पी.सी.ध्यनी की युनियन व फ़ोन पर मिली धमकी के चलते जाँच आधिकरी नेजाँच से इन्कार किया(पत्राँक १९८/ई टी सी आर/इन्क्वायरी दि. १६/०१/०७)
४) प्रबन्ध निदेशक ने पत्राँक १७८/प्र. नि./पिटकुल/ई-११ दिनाँकित २० जनवरी २००७ को पुनः सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए तीन सदस्यीय (तीनों पुरुष) समिति का गठन किया गया।
५) इस समिति का अध्यक्ष जे. पी. तोमर लगभग डेढ वर्ष पूर्व सेवा निवृत्त हो चुका है।
६) २६ मई २००९ तक सूचना के अधिकार के तहत सूचना माँगे जाने तक मामला लगभग २ वर्ष ६ माह तक लम्बित रहा ।
७) १२ मई २००९ को नई जांच समिति का गठन किया गया जिसका अध्यक्ष राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा को बनाया गया है।
८) नई समिति के गठन तक दोनों पक्षों में कोई समझौता हुआ था। इस समिति के गठन के बाद एक जनसेवक द्वारा इस प्रकरण को नई समिति के सुपुर्द करने हेतु पिटकुल अधिकारियों को एक ज्ञापन दिया गया।
९) उक्त ज्ञापन से पिटकुल अधिकारियों में एक बार फ़िर हड़कंप मच गया और आनन फ़ानन मे पुरानी जाँच समिति के सदस्यों के समक्ष दोनों पक्षों मे. १३ जुलाई २००९ को समझौता दर्शाया गया है जो कानूनी रूप से अवैध है।
यहाँ गौरतलब है कि यौन शोषण की शिकायत को ९० दिनों के भीतर निस्तारित करने के बजाय लगभग ढाई वर्ष तक लम्बित रखा गया। इसके पीछे क्लर्क से वरिष्ठ प्रबन्धक बने कर्मचारी व अधिकारि युनियन के अध्यक्ष पी.सी.ध्यानी ही हैं क्योंकि आरोपित अधिकारी ध्यानी की युनियन का न केवल सक्रिय सदस्य है बल्कि ध्यानी का एक मोहरा है जो ध्यानी के लिए कुछ भी कर सकता है।
अब प्रश्न उठता है कि लगभग ढाई वर्षों तक न्याय की राह देखने वाली महिला अधिकारी ने अचानक समझौता कैसे कर लिया । विभाग से छ्न कर आने वाली खबरों को यदि सच माना जाये तो उक्त महिला अधिकारी ने एक लाख रुपये तथा पति के स्थानान्तरण के आश्वासन के बाद ही समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं ।
यदि इसमें ज़रा सी भी सच्चाई है तो निश्चित रुप से यह एक कलंक से कम नहीं क्योंकि कुछ महिलायें किसी पुरुष अधिकारी पर आरोप लगाकर अपना हित साध सकती हैं किन्तु इसक एक दूसरा पहलू भी है कि एक जूनियर अधिकारी अपने ही विभाग से उलझने की हिम्मत नहीं कर सकती और अधिकारियों के दबाव के चलते उसने इस समझौते पर हस्ताक्षर किये हों ।
चाहे जो भी पहलू हों किन्तु इस प्रकरण को पुनः जाँच कमेटी को सुपुर्द करके निष्पक्ष जाँच करायी जाए
पिट्कुल अधिकारियों ने इंसानियत की सारी हदें तब पार कर दी
पिट्कुल अधिकारियों ने इंसानियत की सारी हदें तब पार कर दी जब एक उप महाप्रबन्धक के विरुद्ध यौन शौषण की शिकायत दर्ज कराने वाली महिला अवर अभियन्ता(प्रशिक्षु) पर स्थानान्तरण के लिये झूठा आरोप लगाकर आरोपी उपमहाप्रबन्धक को ना केवल आरोपमुक्त किया गया बल्की उसे पदोन्नत करके मलाईदार पद से भी नवाजा गया।सूचना का अधिकार के तहत प्राप्त दस्त्तावेजों से पिट्कुल मे व्याप्त नैतिक व आर्थिक भ्रष्टाचार क परत दर परत खुलासा निम्न प्रकार है:-
१.) मुख्यालय पर तैनात एक महिला अवर अभियन्ता(प्रशिक्षु) ने एक उप महाप्रबन्धक के विरुद्ध यौन शौषण की शिकायत २० जून २००८ को प्रबन्ध निदेशक के समक्ष की गयी।
२.) २० जून २००८ को ही निदेशक(मा.स.) द्वारा नोट्स एवं ऑर्डर तैयार करके प्रबन्ध निदेशक से अनुमोदन प्राप्त कर लिया गया।
३.)२० जून २००८ को तैयार नोट्स एवं ऑर्डर में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का हवाला देते हुए। इन्टरनेट से डाउनलोड किये गये १ से ४ तक कुल चार पृष्ठ के दिशा निर्देशों को भी संलग्न किया गया।
४.) निदेशक(मा.स.)द्वारा तैयार उक्त नोट्स एण्ड ऑर्डर के साथ संलग्नक के रूप में सुप्रीमे कोर्ट के दिशा निर्देशों के पेज संख्या ४ पर बिन्दु ७ पर स्पष्ट रूप से लिखा है कि जाँच समिती क गठन इस प्रकार किया जाये कि समिती का अध्यक्ष महिला होने के साथ साथ आधे सदस्य भी महिलायें होनी चाहिये।
५.) इस प्रकरण का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि रिश्वत खा कर उच्च अधिकारियों द्वारा यौन शौषण कि शिकायत को ऑफ़िशियल मिस्कण्डक्ट की शिकायत मे बदल दिया।
६.) २५ जून २००८ तक कोई कार्यावाही नही होने के कारण शिकायत कर्ता द्वारा आरोपि उपमहाप्रबन्धक द्वारा भेजे गये एस एम एस की प्रति भी संलग्न की।
७.) निदेशक(मा.स.) द्वारा पुन: नोट्स एण्ड ऑर्डर तैयार कर प्रबन्ध निदेशक से अनुमोदन प्राप्त किया।
८.) इस बार निदेशक(मा.स.)द्वारा अपने नोट्स एण्ड ऑर्डर में यौन शौषण के स्थान पर आफिशियल मिसकण्डक्ट शब्द का प्रयोग किया गया। ॰ इससे शर्मनाक और क्या हो सकता था कि एक अबला द्वारा अपना सम्मान बचाने के लिये की गयी शिकायत को निदेशक(मा॰ स॰) व अन्य अपनी कमाई का जरिया बनाकर पहले यौन शोष्ण का हव्वा खडा करेगें और रिशवत खाकर जाँच का विषय ही बदल देंगे।॰ इस प्रकार एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट अवमानना करते हूए पिटकुल अधिकारियों द्वारा एक अबला को चरित्र हनन किया है क्योंकि उक्तमहिला को ही स्थानान्तरण के लिये झूठी शिकायत करने का दोषी करार करते हुए आरोपित उपमहाप्रबन्धक को आरोप मुक्त करके पदोन्नत किया गया ।
९.) एक बार फ़िर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए निदेशक(म.स.)ने यौन शौषण की शिकायत को ऑफ़िसियल मिसक्ण्डक्ट मे बदल दिया।
१०.) जाँच महाप्रबन्धक(सी एंड पी) एस.सी.गोयल को सौंपी गयी तथा महाप्रबन्धक(मा.स.)को प्रिजंइन्टिन्ग ऑफ़िसर बनया गया।
११.) यौन शौषण की शिकायत पर जाँच के दौरान, आरोपित अधिकारी पीड़ित महिला व्यक्तिगत रूप से क्रास परिक्षण नहीं कर सकता जब तक पीड़ित महिला इसके लिये अनुमति न दे।
१२.)इस प्रकरण में पीड़िता का क्रास परिक्षण न केवल आरोपित अधिकारी द्वारा किया बल्की आरोपित के कानूनी सहायक ने भी पीड़िता का क्रास परिक्षण किया।
१३.) क्या ये सम्भव है कि एक पद में सब से छोटे स्तर(अवर अभियन्ता) पर कार्यरत एक महिला(प्रशिक्षु) अधिकारी अपने ही विभाग के दो महाप्रबन्धकों ,एक उप महाप्रब्न्धक व एक कानूनी सहायक की उपस्थिति में अपना बयान दे सकती है और उनके द्वारा क्रास परिक्षण मे दागे गये प्रश्नों का उत्तर दे सकती है।
१४.) इससे पीड़िता के ऊपर मानसिक दबाव बनाकर आरोपित के पक्ष में बयान दर्ज कराया गया है।
१५.) आरोपित अधिकारी ने अपने मोबाईल से पीड़िता के मोबाईल पर भेजे गये मैसेज के बारे में सफ़ाई दी कि उसका मोबाईल किसी ने हैक करके पीड़िता के मोबाईल पर मैसेज भेजे गये हैं इसके समर्थन में समाचार पत्र में प्रकाशित एक लेख की छायाप्रति लगायी गयी है।
१.) मुख्यालय पर तैनात एक महिला अवर अभियन्ता(प्रशिक्षु) ने एक उप महाप्रबन्धक के विरुद्ध यौन शौषण की शिकायत २० जून २००८ को प्रबन्ध निदेशक के समक्ष की गयी।
२.) २० जून २००८ को ही निदेशक(मा.स.) द्वारा नोट्स एवं ऑर्डर तैयार करके प्रबन्ध निदेशक से अनुमोदन प्राप्त कर लिया गया।
३.)२० जून २००८ को तैयार नोट्स एवं ऑर्डर में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का हवाला देते हुए। इन्टरनेट से डाउनलोड किये गये १ से ४ तक कुल चार पृष्ठ के दिशा निर्देशों को भी संलग्न किया गया।
४.) निदेशक(मा.स.)द्वारा तैयार उक्त नोट्स एण्ड ऑर्डर के साथ संलग्नक के रूप में सुप्रीमे कोर्ट के दिशा निर्देशों के पेज संख्या ४ पर बिन्दु ७ पर स्पष्ट रूप से लिखा है कि जाँच समिती क गठन इस प्रकार किया जाये कि समिती का अध्यक्ष महिला होने के साथ साथ आधे सदस्य भी महिलायें होनी चाहिये।
५.) इस प्रकरण का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि रिश्वत खा कर उच्च अधिकारियों द्वारा यौन शौषण कि शिकायत को ऑफ़िशियल मिस्कण्डक्ट की शिकायत मे बदल दिया।
६.) २५ जून २००८ तक कोई कार्यावाही नही होने के कारण शिकायत कर्ता द्वारा आरोपि उपमहाप्रबन्धक द्वारा भेजे गये एस एम एस की प्रति भी संलग्न की।
७.) निदेशक(मा.स.) द्वारा पुन: नोट्स एण्ड ऑर्डर तैयार कर प्रबन्ध निदेशक से अनुमोदन प्राप्त किया।
८.) इस बार निदेशक(मा.स.)द्वारा अपने नोट्स एण्ड ऑर्डर में यौन शौषण के स्थान पर आफिशियल मिसकण्डक्ट शब्द का प्रयोग किया गया। ॰ इससे शर्मनाक और क्या हो सकता था कि एक अबला द्वारा अपना सम्मान बचाने के लिये की गयी शिकायत को निदेशक(मा॰ स॰) व अन्य अपनी कमाई का जरिया बनाकर पहले यौन शोष्ण का हव्वा खडा करेगें और रिशवत खाकर जाँच का विषय ही बदल देंगे।॰ इस प्रकार एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट अवमानना करते हूए पिटकुल अधिकारियों द्वारा एक अबला को चरित्र हनन किया है क्योंकि उक्तमहिला को ही स्थानान्तरण के लिये झूठी शिकायत करने का दोषी करार करते हुए आरोपित उपमहाप्रबन्धक को आरोप मुक्त करके पदोन्नत किया गया ।
९.) एक बार फ़िर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए निदेशक(म.स.)ने यौन शौषण की शिकायत को ऑफ़िसियल मिसक्ण्डक्ट मे बदल दिया।
१०.) जाँच महाप्रबन्धक(सी एंड पी) एस.सी.गोयल को सौंपी गयी तथा महाप्रबन्धक(मा.स.)को प्रिजंइन्टिन्ग ऑफ़िसर बनया गया।
११.) यौन शौषण की शिकायत पर जाँच के दौरान, आरोपित अधिकारी पीड़ित महिला व्यक्तिगत रूप से क्रास परिक्षण नहीं कर सकता जब तक पीड़ित महिला इसके लिये अनुमति न दे।
१२.)इस प्रकरण में पीड़िता का क्रास परिक्षण न केवल आरोपित अधिकारी द्वारा किया बल्की आरोपित के कानूनी सहायक ने भी पीड़िता का क्रास परिक्षण किया।
१३.) क्या ये सम्भव है कि एक पद में सब से छोटे स्तर(अवर अभियन्ता) पर कार्यरत एक महिला(प्रशिक्षु) अधिकारी अपने ही विभाग के दो महाप्रबन्धकों ,एक उप महाप्रब्न्धक व एक कानूनी सहायक की उपस्थिति में अपना बयान दे सकती है और उनके द्वारा क्रास परिक्षण मे दागे गये प्रश्नों का उत्तर दे सकती है।
१४.) इससे पीड़िता के ऊपर मानसिक दबाव बनाकर आरोपित के पक्ष में बयान दर्ज कराया गया है।
१५.) आरोपित अधिकारी ने अपने मोबाईल से पीड़िता के मोबाईल पर भेजे गये मैसेज के बारे में सफ़ाई दी कि उसका मोबाईल किसी ने हैक करके पीड़िता के मोबाईल पर मैसेज भेजे गये हैं इसके समर्थन में समाचार पत्र में प्रकाशित एक लेख की छायाप्रति लगायी गयी है।
वरिष्ठ प्रबन्धक का सफ़ेद झूठ
वरिष्ठ प्रबन्धक का सफ़ेद झूठ पिट्कुल अधिकारी अपने कुकृत्यों पर पर्दा डालने कि नापाक कोशिश करते हुए एक के बाद एक गलती करते जा रहे हैं। इसी क्रम में एक नमूना वरिष्ठ प्रबन्धक पी.सी. ध्यानी नें २६ सितम्बर २००९ को एक राजनैतिक पार्टी के माहिला प्रकोष्ठ की अध्यक्षता द्वारा पिट्कुल में यौन शौषण मामलों को दबाने के विरोध में कुछ समाचार पत्रों मे प्रकाशित समाचारों के आधार पर निष्पक्ष जाँचें व दोषियों पर कार्यवाही हेतु २२ सितम्बर २००९ को ज्ञाँपन दिया था।उक्त पत्र द्वारा वरिष्ठ प्रबन्धक ने महिला प्रकोष्ठ अध्यक्षा को आश्वस्त किया कि समाचार पत्रों में समाचार तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया जिसके समर्थन में कुछ काम कागजात भी अध्यक्षा को भेजे गये। किन्तु ध्यानी द्वारा अध्यक्षा को भेजे गये साक्ष्य अपने आप में झूठ का पुलिन्दा हैं क्योँकि यौन शौषण की पहली शिकायत एक महिला अवर अभियन्ता द्वारा एक पुरुष अभियन्ता के विरुद्ध ९ जनवरी २००७ को दर्ज करायी गयी थी जिस पर कार्यवाही करते हुए पी.सी.ध्यानी ने १२ जनवरी २००७ को नोट्स एवं ऑर्डर का ड्राफ़्ट तैयार किया तथा महाप्रबन्धक(मा.स.) द्वारा १२ जनवरी २००७ को ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशाखा व अन्य बनाम राजस्थान सरकार व अन्य केस में जारी दिशा निर्देशों तथा दि सैक्सुअल हैरास्स्मैन्ट ऑफ़ वॉमन एट वर्क प्लेस(प्रिवेन्शन,प्रोहिविशन एण्ड रिड्रेशल)बिल २००६ के विरुद्ध एकल जाँच समिति गठित करते हुए उपमहाप्रबन्धक कमल कान्त को जाँच सौंप दी गयी। पी. सी. ध्यानी व अन्य लोगों द्वारा कमल कान्त दबाव व फ़ोन पर मिली धमकी के चलते कमल कान्त नेअपने पत्रांक १९८/ई टी सी आर/एन्क्वाइरी दिनांक १६ जनवरी २००७ का जाँच करने से मना कर दिया। २० जनवरी २००७ को प्रबन्ध निदेशक द्वारा नयी जाँच समिती गठिथ की गयी इस बार भी सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के विरुद्ध तीन सदस्य समिती बनी किन्तु सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अनुसार समिती का अध्यक्ष व कम से कम आधे सदस्य महिलाएं होने चाहिये थे किन्तु इस समिती में तीनों सदस्य पुरुष थे। समिती को ९० दिनों में जाँच पूरी करनी चाहिये थी किन्तु ९ जनवरी २००७ से २६ मई २००९ तक कोई प्रगति नहीं हुई। जो कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का प्रकरण बनता है। पी.सी.ध्यनी ने प्रकोष्ठ अध्यक्षा को भेजे गये पत्र में उक्त प्रकरण में समझौता पत्र भी साक्ष्य के रूप मे भेजा गया है। यहाँ गौरतलब है कि ध्यानी ने जो समझौता पत्र भेजा है वह कानूनी रूप से वैध्य नहीं है क्योंकि वह समझौता २० जनवरी २००७ को गठित तीन सदस्य समिती के दो सदस्यों के समक्ष होना दर्शाया गया है जिसका अध्यक्ष लगभग डेढ वर्ष पूर्व सेवानिवृत हो चुका है तथा २६ मई २००९ को सूचना का अधिकार में माँगी गयी सूचना के बाद १२ जून २००९ को नई कमेटी स्वत: ही समाप्त हो चुकी है। यानी जन्ता कि आँखों में धूल झोंकते हुए एक ऐसी समिती के समक्ष समझौता दिखाया गया है जो कि अस्तित्व में ही नहीं है।
उनकी यह डिग्री फर्ज़ी है
सूचना का अधिकार के तहत पिटकुल में कार्यरत लिपिक प्रबन्धक के पद तक पहुँचे कर्मचारी अधिकारी यूनियन के अध्यक्ष पी.सी.ध्यानी द्वारा अपनी श्रीनगर गढ्वाल तैनाती के दौरान बरेली कालेज बरेली से संस्थागत छात्र के रूप में एल. एल. बी. की कथित उपाधी प्राप्त की है।विभागीय सूत्रों का कहना है कि उनकी यह डिग्री फर्ज़ी है इसी तथ्य की तह तक पहुँचने की नियत से हमारे द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत पिटकुल से सूचनायें चाहीं थी कि ध्यानी की डिग्री कि सत्यापित प्रतिलिपि, एल. एल.बी. की शिक्षा ग्रहण करने से पूर्व ली गयी विभागीय अनुमति तथा संस्थागत छात्र के रूप में जरूरी ७५ प्रतिशत उपस्थिति हेतु आवश्यक विभागीय अवकाशों का विवरण तथा सेवा पंजिका की सत्यापित प्रतिलिपि।
जिसके जवाब में केवल एल. एल.बी. तृतीय वर्ष का अंक पत्र उपलब्ध कराया गया । अधिनियम के तहत विभागीय अपील का भी वही आदेश था कि शेष सभी सूचनायें पी.सी.ध्यनी की व्यक्तिगत सूचनायें है तथा इसको उपलब्ध नही कराया जा सकता । हालाँकि यह प्रकरण अब उत्तराखण्ड राज्य सूचना आयोग में लाम्बित है तथा १८ दिसम्बर २००९ को इस पर पहली सुनवाई की जायेगी ।जिस प्रकार पिटकुल द्वारा ध्यानी द्वारा काथित एल. एल बी. करने के दौरान अवकाशों का विवरण न देने से डिग्री फर्ज़ी होने कि बात को बल मिलता है।यहाँ आपको बताते चलें कि इसी कथित एल. एल.बी. उपाधि के आधार पर ध्यानी को यौन शोषण की शिकायतों का निस्तारण करने के लिये गठित कमेटी में मैम्बर लीगल बैकग्राउण्ड यानी कानूनी प्रष्ठ भूमि का सदस्य बनाया गया।और यहाँ यह और भी महत्वपूर्ण इस लिये हो जाता है क्योंकि पिटकुल के गठन से आज तक यौन शोषण कि दो शिकायतें प्राप्त हुई और दोनों ही केसों में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों को ताक पर रखकर रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया। इससे स्पष्ट हो जाता है या तो ध्यानी को कानूनी ज्ञान नही है य फिर इन्होंने रिश्वत लेकर जानबूझ कर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करवायी है।चूंकि पी. सी. ध्यानी ने अकूत धन अर्जन के साथ-साथ शासन, प्रशासन व सत्ता कि गलियारों में गेहरी पैठ बना ली है जिसके चलते इनके विरुद्ध सरकार द्वारा शायद ही कोई कार्यवाही की जाये।
जिसके जवाब में केवल एल. एल.बी. तृतीय वर्ष का अंक पत्र उपलब्ध कराया गया । अधिनियम के तहत विभागीय अपील का भी वही आदेश था कि शेष सभी सूचनायें पी.सी.ध्यनी की व्यक्तिगत सूचनायें है तथा इसको उपलब्ध नही कराया जा सकता । हालाँकि यह प्रकरण अब उत्तराखण्ड राज्य सूचना आयोग में लाम्बित है तथा १८ दिसम्बर २००९ को इस पर पहली सुनवाई की जायेगी ।जिस प्रकार पिटकुल द्वारा ध्यानी द्वारा काथित एल. एल बी. करने के दौरान अवकाशों का विवरण न देने से डिग्री फर्ज़ी होने कि बात को बल मिलता है।यहाँ आपको बताते चलें कि इसी कथित एल. एल.बी. उपाधि के आधार पर ध्यानी को यौन शोषण की शिकायतों का निस्तारण करने के लिये गठित कमेटी में मैम्बर लीगल बैकग्राउण्ड यानी कानूनी प्रष्ठ भूमि का सदस्य बनाया गया।और यहाँ यह और भी महत्वपूर्ण इस लिये हो जाता है क्योंकि पिटकुल के गठन से आज तक यौन शोषण कि दो शिकायतें प्राप्त हुई और दोनों ही केसों में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों को ताक पर रखकर रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया। इससे स्पष्ट हो जाता है या तो ध्यानी को कानूनी ज्ञान नही है य फिर इन्होंने रिश्वत लेकर जानबूझ कर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करवायी है।चूंकि पी. सी. ध्यानी ने अकूत धन अर्जन के साथ-साथ शासन, प्रशासन व सत्ता कि गलियारों में गेहरी पैठ बना ली है जिसके चलते इनके विरुद्ध सरकार द्वारा शायद ही कोई कार्यवाही की जाये।
यौन शोषण की शिकायत के निस्तारण की प्रक्रिया शुरू कर दी
जहाँ एक ओर राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को समान अधिकारों की बहस छिड़ी है वहीं दूसरी ओर कामकाजी महिलाओं द्वारा यौन शोषण की शिकायत करने पर भी उल्टे महिलाओं को ही दोषी ठहराया जा रहा है।निदेशक(मा.स.) ने तो इन्सानियत की सारी हदें तब पार कर दी जब उनके द्वारा यौन शोषण की शिकायत को ऑफ़िशियल मिसकण्डक्ट में बदला गया।
हुआ कुछ यूं कि पिटकुल मुख्यालय पर तैनात एक महिला अवर अभियन्ता(प्रशिक्षु) द्वारा मुख्यालय में ही तैनात एक उपमहाप्रबन्धक की अश्लील हरकतों से परेशान होकर पहले तो निदेशक(मा.स.) से मौखिक शिकायत की तथा १९ जून २००८ को छुट्टी पर जाने से पूर्व भी उसने निदेशक(मा.स.) से मौखिक शिकायत की। उसके बाद पीड़िता ने २० जून २००८ को प्रबन्ध निदेशक के नाम लिखित शिकायती पत्र भेजा।
चूंकि निदेशक(मा.स.) से पीड़िता ने मौखिक शिकायत २० जून २००८ से पूर्व ही कर दी थी तथा जब पीड़िता १९ जून २००८ से तीन दिन के अवकाश का प्रार्थना पत्र लेकर महाप्रबन्धक(मा.स.) से मिली तब महाप्रबन्धक(मा.स.) व निदेशक(मा.स.)दोनों ने पीड़िता के मूड को भाँपकर यौन शोषण की शिकायत के निस्तारण की प्रक्रिया शुरू कर दी जिसके फ़लस्वरूप उन्होंने इन्टरनेट से यौन शोषण की शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश ढ़ूंढ़ना शुरू कर दिये तथा १९ जून २००८ को ही इन्टरनेट पर एक वेबसाइट
से चार पेज के दिशा निर्देश को प्रिंट किया गया।गौरतलब है कि पीड़िता ने शिकायत २० जून २००८ को की थी फिर यौन शोषण की शिकायतों के निस्तारण हेतु दिशा निर्देश १९ जून २००८ क्यों प्रिंट किये गये?मतलब एकदम साफ है कि पीड़िता कई बार मौखिक रूप से निदेशक(मा.स.) व महाप्रबन्धक(मा.स.)से उपमहाप्रबन्धक द्वारा की जा रही अश्लील हरकतों की शिकायत कर चुकी थी तथा १९ जून २००८ को अन्तिम बार पीड़िता द्वारा महाप्रबन्धक(मा.स.) से ये मौखिक शिकायत की गयी। पीड़िता के तीन दिन की छुट्टी पर जाने से महाप्रबन्धक(मा.स.) व निदेशक(मा.स.)परेशान हो गये तथा उन्होंने यौन शोषण की लिखित शिकायत से पूर्व ही शिकायत के निस्तारण की प्रक्रिया शुरू करते हुए इन्टरनेट से इस प्रकार की शिकायतों के निस्तारण हेतू सुप्रीम कोर्ट के चार पेज के दिशा निर्देश प्रिंट कर लिये।
२०जून २००८ को जैसे ही पीड़िता ने लिखित शिकायत मुख्यालय में जमा करायी वैसे ही मानव संसाधन विभाग हरकत में आ गया और आनन-फ़ानन में एक नोट्स एण्ड ऑर्डर तैयार किया गया तथा उसी दिन प्रबन्ध निदेशक से अनुमोदन भी प्राप्त कर लिया गया जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया कि यौन शोषण की इस शिकायत का निस्तारण सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप किया जाये तथा प्रशासनिक कारणों के आधार पर आरोपी का स्थानान्तरण देहरादून से श्रीनगर किया जाये ।गौरतलब है कि प्रबन्ध निदेशक से अनुमोदन मिलने के पश्चात शुरू हुआ आरोपी को बचाने के लिए सौदेबाज़ी का दौर और यदि विभागीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी को सच माना जाये तो आरोपी से आरोप मुक्त करते हुए पदोन्नति के साथ देहरादून वापस लाने हेतू मोटी रकम माँगी गयी ।इस खेल के बड़े खिलाड़ी तत्कालीन प्रबन्ध निदेशक , निदेशक (मा.स.), महाप्रबन्ध (मा.स.), प्रबन्धक (मा.स.), महाप्रबन्धक (सी. एण्ड पी.) हैं, जिनको जाँच अधिकारी नियुक्त किया गया था ।
रिश्वत खाकर मानव संसाधन स्कन्ध ने २५ जून २००८ को एक नया नोट्स एण्ड ऑर्डर तैयार किया तथा निदेशक (मा.स.) के हस्ताक्षरों से प्रबन्ध निदेशक का अनुमोदन प्राप्त किया गया । जिसमें लिखा गया कि -
१) श्री अनिल यादव का स्थानान्तरण देहरादून से श्रीनगर चेन प्रोसेस के तहत किया गया है, अतः यह प्रशासनिक आधार पर है, के लिये एक अलग आदेश दिया जाए ।
२) उनको जाँच के दौरान निलम्बित रखा जाये ताकि उपमहाप्रबन्धक (प्रभारी) के पद पर कार्य करते हुए वह जाँच प्रभावित कर सकते हैं ।
३) आरोपी अधिकारी से चार्ज शीट का जवाब मांगा जाये जिसका ड्रॉफ़्ट संलग्न है ।
४) श्री ए. सी. गोयल को जाँच अधिकारी नियुक्त किया जाये ।
चूंकि इस बचाव अभियान में प्रबन्ध निदेशक सहित सभी शामिल थे इसलिए प्रबन्ध निदेशक ने बिन्दु ३ व ४ को ही अनुमोदित किया ।
यहाँ गौरतलब है कि जिस प्रबन्ध निदेशक ने २० जून २००८ को अनुमोदित किया कि जाँच सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के अनुरूप हो उस ही के द्वारा २५ जून २००८ को नये ड्राफ़्ट का अनुमोदन करना, जो पहले का एकदम उलट हो , प्रबन्ध निदेशक की ईमानदारी के ऊपर एक कलंक है और तत्कालीन प्रबन्ध निदेशक के ईमानदार होने पर एक बडा प्रश्न चिह्न है । वो कौन सी मजबूरी थी जिसके चलते तत्कालीन प्रबन्ध निदेशक ने एक ही प्रकरण में दो विरोधाभाषी आदेश दिये ।
इस प्रकरण के प्रत्येक पहलू से घोर रिश्वत्खोरी की बू आ रही है । सूचना का अधिकार से प्राप्त दस्तावेज़ों से ही यह खुलासा हो सका ।
अब सरकार को चाहिए कि रिश्वत्खोरी के इस प्रकरण के लिये कम से कम सात सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन कर के निष्पक्ष जाँच करायें ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके
हुआ कुछ यूं कि पिटकुल मुख्यालय पर तैनात एक महिला अवर अभियन्ता(प्रशिक्षु) द्वारा मुख्यालय में ही तैनात एक उपमहाप्रबन्धक की अश्लील हरकतों से परेशान होकर पहले तो निदेशक(मा.स.) से मौखिक शिकायत की तथा १९ जून २००८ को छुट्टी पर जाने से पूर्व भी उसने निदेशक(मा.स.) से मौखिक शिकायत की। उसके बाद पीड़िता ने २० जून २००८ को प्रबन्ध निदेशक के नाम लिखित शिकायती पत्र भेजा।
चूंकि निदेशक(मा.स.) से पीड़िता ने मौखिक शिकायत २० जून २००८ से पूर्व ही कर दी थी तथा जब पीड़िता १९ जून २००८ से तीन दिन के अवकाश का प्रार्थना पत्र लेकर महाप्रबन्धक(मा.स.) से मिली तब महाप्रबन्धक(मा.स.) व निदेशक(मा.स.)दोनों ने पीड़िता के मूड को भाँपकर यौन शोषण की शिकायत के निस्तारण की प्रक्रिया शुरू कर दी जिसके फ़लस्वरूप उन्होंने इन्टरनेट से यौन शोषण की शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश ढ़ूंढ़ना शुरू कर दिये तथा १९ जून २००८ को ही इन्टरनेट पर एक वेबसाइट
से चार पेज के दिशा निर्देश को प्रिंट किया गया।गौरतलब है कि पीड़िता ने शिकायत २० जून २००८ को की थी फिर यौन शोषण की शिकायतों के निस्तारण हेतु दिशा निर्देश १९ जून २००८ क्यों प्रिंट किये गये?मतलब एकदम साफ है कि पीड़िता कई बार मौखिक रूप से निदेशक(मा.स.) व महाप्रबन्धक(मा.स.)से उपमहाप्रबन्धक द्वारा की जा रही अश्लील हरकतों की शिकायत कर चुकी थी तथा १९ जून २००८ को अन्तिम बार पीड़िता द्वारा महाप्रबन्धक(मा.स.) से ये मौखिक शिकायत की गयी। पीड़िता के तीन दिन की छुट्टी पर जाने से महाप्रबन्धक(मा.स.) व निदेशक(मा.स.)परेशान हो गये तथा उन्होंने यौन शोषण की लिखित शिकायत से पूर्व ही शिकायत के निस्तारण की प्रक्रिया शुरू करते हुए इन्टरनेट से इस प्रकार की शिकायतों के निस्तारण हेतू सुप्रीम कोर्ट के चार पेज के दिशा निर्देश प्रिंट कर लिये।
२०जून २००८ को जैसे ही पीड़िता ने लिखित शिकायत मुख्यालय में जमा करायी वैसे ही मानव संसाधन विभाग हरकत में आ गया और आनन-फ़ानन में एक नोट्स एण्ड ऑर्डर तैयार किया गया तथा उसी दिन प्रबन्ध निदेशक से अनुमोदन भी प्राप्त कर लिया गया जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया कि यौन शोषण की इस शिकायत का निस्तारण सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप किया जाये तथा प्रशासनिक कारणों के आधार पर आरोपी का स्थानान्तरण देहरादून से श्रीनगर किया जाये ।गौरतलब है कि प्रबन्ध निदेशक से अनुमोदन मिलने के पश्चात शुरू हुआ आरोपी को बचाने के लिए सौदेबाज़ी का दौर और यदि विभागीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी को सच माना जाये तो आरोपी से आरोप मुक्त करते हुए पदोन्नति के साथ देहरादून वापस लाने हेतू मोटी रकम माँगी गयी ।इस खेल के बड़े खिलाड़ी तत्कालीन प्रबन्ध निदेशक , निदेशक (मा.स.), महाप्रबन्ध (मा.स.), प्रबन्धक (मा.स.), महाप्रबन्धक (सी. एण्ड पी.) हैं, जिनको जाँच अधिकारी नियुक्त किया गया था ।
रिश्वत खाकर मानव संसाधन स्कन्ध ने २५ जून २००८ को एक नया नोट्स एण्ड ऑर्डर तैयार किया तथा निदेशक (मा.स.) के हस्ताक्षरों से प्रबन्ध निदेशक का अनुमोदन प्राप्त किया गया । जिसमें लिखा गया कि -
१) श्री अनिल यादव का स्थानान्तरण देहरादून से श्रीनगर चेन प्रोसेस के तहत किया गया है, अतः यह प्रशासनिक आधार पर है, के लिये एक अलग आदेश दिया जाए ।
२) उनको जाँच के दौरान निलम्बित रखा जाये ताकि उपमहाप्रबन्धक (प्रभारी) के पद पर कार्य करते हुए वह जाँच प्रभावित कर सकते हैं ।
३) आरोपी अधिकारी से चार्ज शीट का जवाब मांगा जाये जिसका ड्रॉफ़्ट संलग्न है ।
४) श्री ए. सी. गोयल को जाँच अधिकारी नियुक्त किया जाये ।
चूंकि इस बचाव अभियान में प्रबन्ध निदेशक सहित सभी शामिल थे इसलिए प्रबन्ध निदेशक ने बिन्दु ३ व ४ को ही अनुमोदित किया ।
यहाँ गौरतलब है कि जिस प्रबन्ध निदेशक ने २० जून २००८ को अनुमोदित किया कि जाँच सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के अनुरूप हो उस ही के द्वारा २५ जून २००८ को नये ड्राफ़्ट का अनुमोदन करना, जो पहले का एकदम उलट हो , प्रबन्ध निदेशक की ईमानदारी के ऊपर एक कलंक है और तत्कालीन प्रबन्ध निदेशक के ईमानदार होने पर एक बडा प्रश्न चिह्न है । वो कौन सी मजबूरी थी जिसके चलते तत्कालीन प्रबन्ध निदेशक ने एक ही प्रकरण में दो विरोधाभाषी आदेश दिये ।
इस प्रकरण के प्रत्येक पहलू से घोर रिश्वत्खोरी की बू आ रही है । सूचना का अधिकार से प्राप्त दस्तावेज़ों से ही यह खुलासा हो सका ।
अब सरकार को चाहिए कि रिश्वत्खोरी के इस प्रकरण के लिये कम से कम सात सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन कर के निष्पक्ष जाँच करायें ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके
Monday, November 2, 2009
करनपुर गोली काण्डः कौन है राजेश का हत्यारा
देहरादून। १९९४ के करनपुर गोली कंाड में मारे गये निर्दोष राजेश रावत के हत्यारे कौन हैं यह अभी भी स्पष्ट नहीं हो पाया है। जबकि यह मामला पिछले कई सालों से अदालत में विचाराधीन है। करनपुर के गोली कांड में उस वक्त राज्य आंदोलन के लिए सडकों पर उतर रहे आंदोलनकारियों पर उस समय गोलियां बरसायी गई थी जब वह आंदोलन के लिए करनपुर क्षेत्र में मुलायम सिंह यादव की पार्टी में रहने वाले सूर्यकांत धस्माना के आवास की ओर जा रहे थे। भीड को तितर-बितर करने के लिए सूर्यकांत धस्माना की छत से आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाई गई थी और इस गोलीकांड में आंदोलनकारी राजेश रावत की मौत हो गई थी जबकि एक अन्य मोहन रावत इस गोलीकांड में घायल हो गया था। जिसके बाद घायल मोहन रावत ने सूर्यकांत धस्माना पर छत से गोली चलाये जाने की बात कही थी और इस गोलीकांड का मुख्य आरोपी सूर्यकांत धस्माना को बताया गया था। कई सालों से कोर्ट में चल रहे इस मामले की जब सुनवाई तेज हुई तो कोर्ट में भी गवाहों ने धस्माना पर गोली चलाने की बात कही थी। जिसके बाद उस समय सूर्यकांत धस्माना एनसीपी छोडकर कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गये थे और गवाहों ने जिस समय कोर्ट मेंधस्माना को गोली चलाने की बात कही थी तो उस समय कांग्रेस ने प्रदेश मीडिया प्रभारी के पद से धस्माना की छुट्टी कर दी थी और धस्माना को कई कांग्रेसी नेताओं ने भी करनपुर गोलीकांड का दोषी करार दिया था। अब करनपुर गोलीकांड की सीबीआई जांच कर रही है और सीबीआई के विशेष न्यायधीश की अदालत में पुलिस के विवेचना अधिकारियों सहित ६ लोग गवाही के लिए पेश नहीं हो सके उस पर भी उंगलियां उठनी शुरू हो गयी हैं। ३ अक्टूबर को हुए करनपुर गोलीकांड में तीन चश्मदीद गवाहों अजीत रावत, धनंजय खंडूरी और रविन्द्र रावत ने अदालत में गवाही के दौरान धस्माना के हाथ में कोई हथियार न होने की जो बात कही है वह उनके पूर्व के दिये गये बयानों में विरोधाभाष पैदा कर रही है। जबकि मोहन रावतं गोली चलाए जाने की बात कह रहे हैं। अब गवाहों के अचानक अपने बयान बदल लेने के पीछे भी राजनैतिक ड्रामा सामने आ गया है। बताया जा रहा है कि गवाहों को बदलने की एवज में कथित रूप् से लाखों रूपये का सौदा किया जा चुका है और गवाहों को कथित रुप से तीन-तीन बिघा जमीन दिये जाने की भी चर्चाएं हो रही हैं इसके साथ ही धस्माना की छत से गोली चलाए जाने की बात पुलिस एवं अन्य गवाहों द्वारा भी की गई है। तो आखिर किस आधार पर कोर्ट में गवाही देने वाले गवाहों ने छत से गोली न चलाए जाने की बात कह डाली है। इस खेल के पीछे मोटी रकम का सौदा होना बताया जा रहा है। हालांकि देर शाम तक बाकी के बचे गवाहों की भी गवाही पूरी हो जाएगी लेकिन कोर्ट अपना फैसला कब सुनाएगी इसका इंतजार मृतक के परिजनों के साथ-साथ उत्तराखंड के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले आंदोलनकारियों को भी है। हालांकि सीबीआई के पास इस मामले में धस्माना के खिलापफ महत्वपूर्ण साक्ष्य मौजूद हैं जिसके आधार पर चर्चा थी कि धस्माना को सजा मिलनी तय है। वहीं देहरादून के वरिष्ठ पत्रकार प्रताप सिंह परवाना भी कथित रुप से धस्माना के गोली चलाए जाने की बात सुनने में आई है। कहा जा रहा है कि उनका साफ कहना है कि राज्य आंदोलन के लिए सडकों पर प्रदर्शन कर रही भीड पर सूर्यकांत धस्माना ने अपनी छत से कथित रुप से गोली चलायी थी और उस घटनाक्रम के कई फोटो भी उनके पास है उन्होंने कहा कि यदि इस मामले में धस्माना को कोर्ट से राहत मिलती है तो पीडत पक्ष को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना की बात वह कह रहे हैं, जिससे उन्हें न्याय मिल सके। उन्होंने कहा कि करनपुर गलीकांड के कई ऐसे सबूत भी मौजूद हैं जिन्हें यदि सार्वजनिक किया गया तो दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जायेगा। कुल मिलाकर इस पूरे मामले में अब भाजपा का एक गुट भी धस्माना के खिलापफ मोर्चा बांध्ेा हुए है। और उन नेताओंे का साफ कहना है कि करनपुर गोलीकांड में आंदोलनकारी मृतक रावत को तभी न्याय मिलेगा जब उनके हत्यारे को कडी सजा मिल जायेगी। इस पूरे मामले में कई नेताओं द्वारा राजनैतिक रोटियां सेकने के बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और न्याय की आस पाने के लिए मृतक के परिजनों की आंखें तरस गई हैं और अब उन्हें पूरा भरोसा है कि इन्साफ के मंदिर में उन्हें सच्चा न्याय मिलेगा। लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस तरह से गवाहों ने अपने बयान बदलकर एक आंदोलनकारी के शहीद होने की बात का छिपाने का प्रयास किया है उससे पूरा आंदोलनकारी मंच भी शर्मसार हुआ है। अब ऐसे में किस तरह एक स्वस्थ न्याय की परिकल्पना को साकार किया जा सकता है। यह अपनेआप में देखने वाली बात है। वहीं राजनैतिक दलों में भी यह चर्चाएं हैं कि इस मामले में कहीं शहीद के हत्यारे साफ बच न निकलें।
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